न पेड़ कटते हैं न चढ़ती है बाजार की मिठाई: 820 साल पुराने नागौर के इस मंदिर का अनोखा रहस्य, जहां होती है सांपों की पूजा

नागौर के डिडिया गांव में स्थित कांसजी महाराज मंदिर अपनी अनूठी परंपराओं के लिए मशहूर है, जहां पवित्र तालाब में स्नान से त्वचा रोग ठीक होने की मान्यता है और सांपों को मारना व पेड़ काटना पूरी तरह वर्जित माना जाता है।

राजस्थान के नागौर जिले की जायल तहसील के डिडिया गांव में सैकड़ों वर्ष पुराना एक ऐतिहासिक और रहस्यमयी मंदिर बसा है, जिसे कांसजी महाराज मंदिर के नाम से पहचाना जाता है। इस मंदिर से जुड़ी कई ऐसी अनूठी और अचंभित कर देने वाली परंपराएं हैं, जो आधुनिक समाज को सोचने पर मजबूर कर देती हैं। स्थानीय लोगों की मान्यता है कि मंदिर परिसर में एक बेहद पवित्र और चमत्कारी तालाब है, जिसमें पूरी श्रद्धा से स्नान करने पर कोढ़ यानी त्वचा से जुड़ी गंभीर बीमारियां पूरी तरह दूर हो जाती हैं।

820 साल पुरानी आस्था और मनौती की परंपरा

गांव के बुजुर्ग रामकिशोर के अनुसार यह पावन स्थल करीब 820 साल से भी अधिक प्राचीन है। त्वचा संबंधी परेशानियों से छुटकारा पाने की चाह में दूर-दूर से पीड़ित लोग यहां पहुंचते हैं और अपनी मनौती मांगते हैं। जब भक्तों की मनोकामना पूरी हो जाती है, तो वे लौटकर मंदिर में विशेष भोग अर्पित करते हैं।

सिर्फ घर का शुद्ध भोग, बाजार की मिठाई वर्जित

इस प्राचीन मंदिर की सबसे खास बात यह है कि यहां बाजार या दुकान से खरीदी हुई मिठाई या परसादी चढ़ाने की अनुमति नहीं है। डिडिया गांव के बुजुर्गों का कहना है कि कांसजी महाराज को केवल घर में शुद्धता के साथ तैयार की गई परसादी और पकवान ही अर्पित किए जाते हैं। यहां मुख्य रूप से ताजे फल और घर पर घी-गुड़ से बने पारंपरिक व्यंजनों का ही भोग लगाया जाता है।

भाद्रपद पंचमी का विशाल मेला

हर साल भाद्रपद पंचमी के दिन यहां एक भव्य मेले का आयोजन होता है, जिसमें शामिल होने के लिए देशभर से श्रद्धालु पहुंचते हैं। इस खास दिन पूरे डिडिया गांव के हर घर में विशेष पकवान बनाए जाते हैं। गांव की अटूट परंपरा के मुताबिक, परिवार के कम से कम एक सदस्य का मंदिर जाकर यह भोग कांसजी महाराज को अर्पित करना अनिवार्य है। भोग की यह प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही घर के बाकी सदस्य भोजन ग्रहण करते हैं।

सांप मारना और पेड़ काटना है महापाप

गांव के एक अन्य बुजुर्ग चितराम जी ने बताया कि भाद्रपद पंचमी के पावन दिन ग्रामीण एक और निराली परंपरा निभाते हैं। इस दिन कोई भी व्यक्ति अपने खेत में काम करने नहीं जाता और कृषि से जुड़े सभी काम पूरी तरह ठप रहते हैं। गांव में आज तक किसी सांप को नहीं मारा गया है। अगर गांव या खेत में कहीं सांप दिख भी जाए, तो लोग उसे नुकसान पहुंचाने के बजाय आदरपूर्वक दूध पिलाते हैं और उसकी पूजा करते हैं। हैरानी की बात यह है कि यहां के सांप भी कभी किसी इंसान को नुकसान नहीं पहुंचाते।

ग्रामीणों का गहरा विश्वास है कि उनके इष्टदेव कांसजी महाराज केर, बबूल और खेजड़ी जैसे जंगली वृक्षों पर निवास करते हैं। यही वजह है कि मंदिर परिसर और आसपास के इलाकों में इन पेड़ों को कभी नहीं काटा जाता। पर्यावरण संरक्षण की यह परंपरा सदियों से लगातार चली आ रही है।

सर्प के श्राप और चमत्कारी तालाब की लोककथा

इस मंदिर की स्थापना के पीछे एक बेहद रोचक लोककथा प्रचलित है। ग्रामीण बताते हैं कि जब इस गांव की बसावट हो रही थी, तब डीडो जी और चांगों जी नाम के दो सगे भाई यहां आए थे। डीडो जी के वंशज डिडौल कहलाए और चांगों जी के वंशज चांगल नाम से प्रसिद्ध हुए। इसी चांगल कुल में खजवाना गांव में कांसजी का जन्म हुआ था। उनके पिता का नाम जसराम और माता का नाम गोरा बाई था।

मान्यता के अनुसार कांसजी के जन्म के साथ ही एक दिव्य सर्प ने भी जन्म लिया था। एक बार जब उनके मामा उनसे मिलने आए, तो उन्होंने बालक कांस के पास एक भयानक सांप बैठा देखा। डर और घबराहट में मामा ने उस सांप को लाठी से मार डाला। मरते समय उस दिव्य सर्प ने मामा को श्राप दिया कि उनका पूरा शरीर कोढ़ यानी कुष्ठ रोग से ग्रस्त हो जाएगा।

कुछ वर्षों बाद जब मामा इस भयानक बीमारी से तड़प रहे थे, तब उन्हें एक दिव्य स्वप्न आया। सपने में उन्हें आदेश मिला कि डिडिया गांव में मंदिर के ठीक पीछे जहां गाय के पैरों के निशान बने हैं, वहां भरे पानी को अपने शरीर पर लगाएं। मामा तुरंत डिडिया गांव पहुंचे और देखा कि वहां सचमुच गाय के खुरों के निशान में चमकीला पानी भरा हुआ था। जैसे ही उन्होंने वह पानी अपने शरीर पर लगाया, उनका कुष्ठ रोग चमत्कारिक रूप से गायब हो गया।

इस महान चमत्कार के बाद उसी स्थान पर एक सुंदर तालाब बनवाया गया और कांसजी महाराज की मूर्ति स्थापित कर पूजा-अर्चना शुरू हुई। तभी से लेकर आज तक यहां लगातार भव्य मेले का आयोजन होता आ रहा है और भक्तों का विश्वास है कि कांसजी महाराज उनके सभी कष्ट दूर करते हैं।

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