उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले से खेती-किसानी की एक बेहद शानदार और प्रेरणादायक खबर सामने आई है। आजकल जहां रासायनिक खादों और महंगे कीटनाशकों के कारण खेती की लागत लगातार बढ़ती जा रही है, वहीं बहराइच के एक युवा किसान ने पारंपरिक लीक से हटकर कुछ नया कर दिखाया है। इस प्रगतिशील किसान ने अपनी सूझबूझ और मेहनत के दम पर बेहद मामूली लागत में बंपर मुनाफा कमाया है। उन्होंने केले की फसल के बीच में ही लौकी की सह-फसली खेती करके सभी को हैरान कर दिया है।
बहराइच जिले के एक ग्रामीण इलाके में रहने वाले युवा किसान काशीराम लंबे समय से कृषि क्षेत्र में नए प्रयोग कर रहे हैं। काशीराम ने पारंपरिक कृषि पद्धतियों के बजाय जैविक खेती को प्राथमिकता दी है। उनका मानना है कि अगर किसान वैज्ञानिक और प्राकृतिक तरीकों का इस्तेमाल करें, तो न केवल पर्यावरण सुरक्षित रहेगा बल्कि खेती की लागत भी लगभग शून्य हो जाएगी। काशीराम की इस अनूठी तकनीक की चर्चा अब आसपास के क्षेत्रों में भी तेजी से फैल रही है।
सह-फसली खेती का स्मार्ट और वैज्ञानिक तरीका
किसान काशीराम ने अपने खेत में जगह और संसाधनों का बेहतरीन उपयोग करने के लिए सह-फसली का रास्ता चुना। वे लौकी की खेती के लिए कोई अलग से खेत तैयार नहीं करते हैं, बल्कि उन्होंने अपने केले के खेत को ही इसके लिए चुना है। केले की दो कतारों के बीच जो खाली जगह बचती है, काशीराम ने उसी जगह पर लौकी के बीज बो दिए। इस स्मार्ट तरीके से उन्हें कई बड़े फायदे हुए हैं:
- सिंचाई के खर्च की भारी बचत: केले के पौधों के विकास के लिए खेत में जो पानी दिया जाता है, वही पानी जमीन में फैलकर लौकी की लताओं को भी मिल जाता है। इस वजह से लौकी की फसल के लिए अलग से पानी चलाने या सिंचाई करने की कोई जरूरत नहीं पड़ती। इससे बिजली और पानी दोनों की बड़ी बचत होती है।
- खाली जगह का सही उपयोग: केले के खेत की खाली जमीन का उपयोग हो जाता है, जिससे खरपतवार उगने की संभावना भी काफी कम हो जाती है।
- कम मेहनत में दोहरी फसल: एक ही खेत में एक साथ दो फसलें तैयार हो जाती हैं, जिससे किसान को दोतरफा आमदनी का जरिया मिलता है।
सिर्फ 300 रुपये के बीज और बिना केमिकल की खेती
आमतौर पर फसलों में खाद, कीटनाशक और दवाओं पर हजारों रुपये खर्च हो जाते हैं। लेकिन काशीराम ने इस पूरी फसल को पूरी तरह जैविक तरीके से तैयार किया है। उन्होंने बाजार से सिर्फ 300 रुपये के लौकी के बीज खरीदे थे। इसके अलावा उन्होंने बाजार से किसी भी प्रकार की रासायनिक खाद या कीटनाशक दवा नहीं खरीदी।
काशीराम अपने घर पर पाले गए पशुओं के गोबर और गोमूत्र का इस्तेमाल करते हैं। वे खुद अपने घर पर ही प्राकृतिक खाद और जैविक कीटनाशक तैयार करते हैं। गोबर की खाद से पौधों को भरपूर पोषक तत्व मिलते हैं और गोमूत्र के छिड़काव से फसलों में बीमारियां नहीं लगतीं। इस प्राकृतिक और घरेलू उपाय की वजह से उनकी खेती की लागत न के बराबर रह गई है और बाजार पर उनकी निर्भरता खत्म हो गई है।
एक बीघे से 20,000 रुपये तक का मुनाफा
जब बात खेती में मुनाफे की आती है, तो काशीराम का यह मॉडल बेहद कामयाब साबित हुआ है। मात्र 300 रुपये के बीज की लागत लगाकर उन्होंने एक बीघे खेत से लौकी की बंपर पैदावार ली है। इस फसल के तैयार होने के बाद उन्हें एक बीघे के क्षेत्र से लगभग 15,000 रुपये से लेकर 20,000 रुपये तक की आमदनी बेहद आसानी से हो जाती है। लागत की तुलना में यह मुनाफा लगभग 20 गुना से भी अधिक है।
इस तरह के मुनाफे ने बहराइच के अन्य किसानों को भी प्रेरित किया है। आज के समय में रासायनिक खेती के कारण भूमि की उर्वरा शक्ति कमजोर हो रही है, ऐसे में काशीराम की जैविक विधि भूमि की सेहत को भी बनाए रखती है और किसान की जेब को भी भारी रखती है।
सेहत के लिए भी बेहद फायदेमंद है यह लौकी
काशीराम के खेत में उगाई गई यह लौकी पूरी तरह से रासायनिक खादों और जहरीले पेस्टिसाइड से मुक्त होती है। आज बाजार में मिलने वाली ज्यादातर सब्जियां रसायनों के सहारे उगाई जाती हैं, जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक साबित हो सकती हैं। इसके विपरीत, पूरी तरह प्राकृतिक और जैविक तरीके से तैयार होने के कारण काशीराम की लौकी स्वास्थ्य के लिए बेहद फायदेमंद और पौष्टिक होती है। यही वजह है कि बाजार में भी इसकी मांग काफी अधिक रहती है और ग्राहकों को भी शुद्ध सब्जी खाने को मिलती है।
बहराइच के किसान काशीराम ने यह साबित कर दिया है कि अगर आधुनिक सोच और पारंपरिक कृषि ज्ञान का सही तालमेल बिठाया जाए, तो कम से कम लागत में भी खेती को एक मुनाफे का सौदा बनाया जा सकता है। उनकी यह सह-फसली और जैविक खेती की तकनीक आज के दौर में सभी छोटे और सीमांत किसानों के लिए एक बेहतरीन उदाहरण है।
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