भारत में पर्यावरण प्रदूषण को कम करने और महंगे कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता घटाने के उद्देश्य से सरकार E20 पेट्रोल (यानी 20 प्रतिशत इथेनॉल और 80 प्रतिशत पेट्रोल का मिश्रण) को तेजी से बढ़ावा दे रही है। हालांकि, इस सकारात्मक बदलाव के साथ ही सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर E20 पेट्रोल को लेकर कई तरह के भ्रम, भ्रामक जानकारियां और कोरी अफवाहें भी तेजी से पैर पसार रही हैं। इंटरनेट पर इंजन के खराब होने, वारंटी खत्म होने, पानी की भारी बर्बादी और पेट्रोल टैंक में चींटियां घुसने जैसे हास्यास्पद दावे वायरल किए जा रहे हैं।
लेकिन सरकारी रिकॉर्ड, ऑटोमोटिव रिसर्च एसोसिएशन ऑफ इंडिया (ARAI), सोसाइटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स (SIAM) और विभिन्न तेल विपणन कंपनियों द्वारा जारी किए गए आधिकारिक स्पष्टीकरण इन दावों की पूरी तरह से पोल खोलते हैं। आइए इस विशेष रिपोर्ट में जानते हैं कि सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे E20 पेट्रोल से जुड़े वे 10 बड़े मिथक कौन से हैं और उनके पीछे की असल हकीकत क्या है।
1. पानी की भारी बर्बादी का भ्रामक दावा (10,000 लीटर का मिथक)
सोशल मीडिया पर यह दावा बहुत वायरल हो रहा है कि केवल 1 लीटर इथेनॉल तैयार करने में लगभग 10,000 लीटर पानी बर्बाद हो जाता है, जिससे देश में जल संकट गहरा सकता है।
सच क्या है: यह दावा पूरी तरह से मनगढ़ंत और वैज्ञानिक तथ्यों से परे है। वास्तविकता यह है कि आधुनिक तकनीक से लैस इथेनॉल उत्पादन संयंत्रों में प्रति लीटर इथेनॉल बनाने में केवल 3 से 5 लीटर पानी का ही वास्तविक उपयोग होता है। इसके साथ ही, यह भ्रम भी फैलाया जा रहा है कि इस प्रक्रिया के कारण आम लोगों के खाने का अनाज छीना जा रहा है। सच यह है कि देश का किसान धान और गेहूं मुख्य रूप से सरकारी खरीद यानी न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) के लिए पैदा करता है। देश की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के बाद जो अतिरिक्त चावल और मक्का बच जाता है, केवल उसी अतिरिक्त स्टॉक का उपयोग औद्योगिक रूप से इथेनॉल बनाने के लिए किया जाता है।
2. भारत के नागरिकों पर जोखिम भरा प्रयोग करने का झूठ
अफवाहों में यह भी दावा किया जा रहा है कि भारत सरकार देश के नागरिकों और उनकी गाड़यों पर बिना किसी पुख्ता तैयारी के एक बेहद खतरनाक और नया प्रयोग कर रही है।
सच क्या है: यह दावा भी पूरी तरह गलत है। वैश्विक स्तर पर इथेनॉल मिश्रित ईंधन का इतिहास एक सदी से भी अधिक पुराना है। यहां तक कि वर्ष 1908 में निर्मित फोर्ड मॉडल टी कार भी इस ईंधन पर चलने के अनुकूल डिजाइन की गई थी। आज के समय में अमेरिका जैसे विकसित देश में E10 को एक मानक ईंधन माना जाता है, जबकि ब्राजील में तो वाहनों के लिए E27 ईंधन का उपयोग कानूनी रूप से अनिवार्य कर दिया गया है। भारत का E20 कार्यक्रम पूरी तरह से वैश्विक स्तर पर स्थापित और स्वीकृत सुरक्षा मानकों के अनुरूप ही लागू किया जा रहा है।
3. गाड़ियों के माइलेज में भारी गिरावट की अफवाह
कार और बाइक चालकों के बीच यह डर फैलाया जा रहा है कि गाड़ी में E20 पेट्रोल डलवाने से उसका माइलेज बहुत ज्यादा घट जाता है और इससे ईंधन का खर्च बढ़ जाता है।
सच क्या है: एआरएआई (ARAI) द्वारा किए गए विभिन्न स्तरों के कड़े परीक्षणों में यह दावा पूरी तरह से भ्रामक साबित हुआ है। संस्थान ने यात्री कारों पर 40,000 किलोमीटर और दोपहिया वाहनों पर 20,000 किलोमीटर तक का सघन व्यावहारिक परीक्षण किया है, जिसमें माइलेज पर कोई भी उल्लेखनीय या बड़ा नकारात्मक असर नहीं देखा गया। इसके विपरीत, इथेनॉल का ऑक्टेन नंबर काफी अधिक (108.5 RON) होता है, जिसके चलते गाड़ियों को और बेहतर एक्सीलरेशन मिलता है जिससे राइड क्वालिटी में सुधार आता है।
4. इंजन के पुर्जे खराब होने और जंग लगने का डर
इंटरनेट पर दावा किया जा रहा है कि इथेनॉल के उपयोग से गाड़ी का इंजन भीतर से सड़ जाता है, उसके पुर्जे खराब हो जाते हैं और उसमें जंग (संक्षारण) लग जाता है।
सच क्या है: इस विषय पर सरकार द्वारा एआरएआई (ARAI) से एक विशेष और गहन अध्ययन कराया गया था। इस अध्ययन में पाया गया कि E20 ईंधन के इस्तेमाल से वाहनों की सुचारू ड्राइविंग, ठंडे मौसम में गाड़ी के स्टार्ट होने की क्षमता या इंजन के धातु और प्लास्टिक के पुर्जों पर कोई बुरा प्रभाव नहीं पड़ता है। केवल बहुत पुरानी हो चुकी कुछ गाड़ियों में ईंधन प्रणाली के रबर से बने हिस्सों को सामान्य से थोड़ा पहले बदलने की जरूरत पड़ सकती है। इसके अलावा, इस ईंधन के उपयोग से वाहनों से निकलने वाले जहरीले धुएं और प्रदूषण में भारी कमी आती है।
5. वाहन की वारंटी और इंश्योरेंस रद्द होने का डर
गाड़ी मालिकों को डराया जा रहा है कि यदि वे अपनी कार या बाइक में E20 ईंधन डलवाते हैं, तो वाहन निर्माता कंपनियां उनकी वारंटी समाप्त कर देंगी और बीमा कंपनियां किसी दुर्घटना की स्थिति में इंश्योरेंस क्लेम देने से साफ मना कर देंगी।
सच क्या है: यह दावा पूरी तरह से निराधार और झूठा है। ऑटोमोबाइल निर्माताओं के प्रमुख संगठन सियाम (SIAM) और सभी बड़ी वाहन कंपनियों ने स्पष्ट कर दिया है कि तय मानकों वाले E20 पेट्रोल के उपयोग से गाड़ियों की वारंटी या बीमा दावों पर कोई विपरीत असर नहीं पड़ेगा। भारत सरकार की एजेंसी पीआईबी (PIB) फैक्ट चेक ने भी 16 जून 2026 को सोशल मीडिया पर चल रही इस भ्रामक खबर का खंडन करते हुए इसे पूरी तरह से असत्य बताया था।
6. पेट्रोल टैंक की तरफ चींटियों और मधुमक्खियों के आकर्षित होने का अजीब दावा
एक बेहद हास्यास्पद दावा सोशल मीडिया पर खूब शेयर हो रहा है कि चूंकि इथेनॉल चीनी और गन्ने से बनता है, इसलिए E20 पेट्रोल में मिठास होने के कारण चींटियां और मधुमक्खियां पेट्रोल टैंक के अंदर घुस जाती हैं और उसे जाम कर देती हैं।
सच क्या है: भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (BPCL) के वैज्ञानिकों और तकनीकी विशेषज्ञों के अनुसार, इस दावे का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। इथेनॉल के निर्माण के दौरान अपनाई जाने वाली डिस्टिलेशन (आसवन) प्रक्रिया में बची हुई चीनी का नामोनिशान पूरी तरह खत्म हो जाता है। इसके अलावा, इस ईंधन में विशेष अपमिश्रक (डीनेचुरेंट्स) मिलाए जाते हैं जो कीड़ों को दूर रखते हैं। टैंक के पास केवल पेट्रोल की तेज गंध ही रहती है, जिससे कीड़े आकर्षित नहीं होते।
7. सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट में इसे केवल 'एक प्रयोग' बताने की अफवाह
इंटरनेट पर यह दुष्प्रचार किया जा रहा है कि खुद सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में यह स्वीकार किया है कि E20 पेट्रोल केवल एक अस्थायी 'प्रयोग' है, जिसे अगले साल समीक्षा के बाद बंद किया जा सकता है।
सच क्या है: यह दावा कानूनी तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करने जैसा है। अटॉर्नी जनरल कार्यालय ने 30 जून 2026 को इस संबंध में स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट के समक्ष विचाराधीन वह मामला केवल इथेनॉल की खरीद के ठेकों और आवंटन की प्रक्रियाओं से संबंधित था। सरकार ने अदालत में E20 को कभी भी एक अस्थायी 'प्रयोग' नहीं कहा है। यह देश की एक बेहद महत्वपूर्ण और स्थायी राष्ट्रीय ईंधन नीति का हिस्सा है।
8. फ्यूल टैंक में तेजी से पानी जमा होने की समस्या
दावा किया जा रहा है कि E20 पेट्रोल में हवा की नमी सोखने की प्रवृत्ति होती है, जिससे गाड़ियों के फ्यूल टैंक में नीचे भारी मात्रा में पानी जमा होने लगता है और इंजन चलते-चलते बंद हो जाता है।
सच क्या है: पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय (MoP&NG) के अनुसार, किसी भी तरह के पेट्रोल में पानी का मिलना इंजन के लिए बेहद नुकसानदेह है। आधुनिक कारों और दोपहिया वाहनों के ईंधन टैंकों के साथ-साथ पेट्रोल पंपों के भूमिगत स्टोरेज टैंकों में पानी के प्रवेश को रोकने के लिए सिलिका जेल ट्रैप, आधुनिक गास्केट और सीलेंट जैसी बेहद उन्नत और पुख्ता सुरक्षा तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है, जिससे टैंक में पानी जाने का खतरा न के बराबर रहता है।
9. पेट्रोल में सीधे गन्ने का रस मिलाने वाले फर्जी वीडियो
फेसबुक और यूट्यूब पर ऐसे कई भ्रामक वीडियो वायरल हो रहे हैं, जिनमें कुछ लोग सीधे पेट्रोल में गन्ने का रस मिलाते हैं और दिखाते हैं कि कैसे पेट्रोल और रस अलग हो गए, जिससे इंजन खराब हो सकता है।
सच क्या है: पेट्रोलियम मंत्रालय ने इन वायरल वीडियो को पूरी तरह से फर्जी और आम जनता को गुमराह करने वाला बताया है। वाहनों में इस्तेमाल होने वाला इथेनॉल कोई सीधे गन्ने का रस नहीं होता, बल्कि उसे कड़े औद्योगिक मानकों के तहत रिफाइनरी में अत्यधिक परिशोधित करके तैयार किया जाता है। सामान्य तापमान पर इथेनॉल और पेट्रोल कभी भी एक-दूसरे से अलग नहीं होते, वे पूरी तरह से एकसार बने रहते हैं।
10. इथेनॉल प्लांट से पर्यावरण और किसानों को नुकसान पहुंचने का भ्रम
अंतिम भ्रामक दावा यह किया जा रहा है कि इथेनॉल बनाने वाले कारखाने आसपास के पर्यावरण को प्रदूषित कर रहे हैं और इससे किसानों का बड़ा नुकसान हो रहा है।
सच क्या है: यह दावा भी तथ्यों के विपरीत है। भारत में संचालित सभी आधुनिक इथेनॉल संयंत्र 'जीरो लिक्विड डिस्चार्ज' (ZLD) तकनीक पर चलते हैं, जिससे उनसे किसी भी तरह का दूषित जल बाहर नहीं निकलता। इन्हें स्थापित करने के लिए कड़े पर्यावरणीय नियमों का पालन करना अनिवार्य होता है। इसके विपरीत, इस राष्ट्रीय कार्यक्रम के चलते देश ने अब तक 1.90 लाख करोड़ रुपये से अधिक की विदेशी मुद्रा की बचत की है। साथ ही, देश के अन्नदाताओं को इथेनॉल आपूर्ति के बदले अब तक 1.60 लाख करोड़ रुपये से अधिक का सीधे भुगतान किया जा चुका है, जिसने ग्रामीण भारत की अर्थव्यवस्था को भारी मजबूती दी है।
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