नेनुआ और लौकी को पीछे छोड़ पूर्वी चंपारण में पैर पसार रही 'चिरचिरा' की खेती, स्वाद के साथ मिल रहा है बंपर मुनाफा

बिहार के पूर्वी चंपारण जिले में पारंपरिक सब्जियों से इतर अब किसान चिरचिरा जैसी अनोखी सब्जी की खेती कर बेहतरीन मुनाफा कमा रहे हैं।

बिहार राज्य कृषि के क्षेत्र में अपनी एक अलग और विशिष्ट पहचान रखता है। यहां के विभिन्न जिलों में पारंपरिक फसलों के साथ-साथ विविध प्रकार की सब्जियों का बड़े पैमाने पर उत्पादन किया जाता है। आमतौर पर बिहार के खेतों में धान, गेहूं और मक्के जैसी मुख्य फसलें लहलहाती दिखाई देती हैं, लेकिन इसके साथ ही मौसमी सब्जियों का भी एक बड़ा बाजार यहां मौजूद है। बैंगन, भिंडी, करेला, नेनुआ और लौकी जैसी आम सब्जियां तो राज्य के हर छोटे-बड़े बाजार में आसानी से उपलब्ध हो जाती हैं। लेकिन इन दिनों बिहार के पूर्वी चंपारण जिले में एक विशेष और अनोखी सब्जी की खेती की तरफ किसानों का रुझान तेजी से बढ़ रहा है। इस अनोखी सब्जी का नाम है चिरचिरा।

पूर्वी चंपारण के इन क्षेत्रों में हो रही है विशेष खेती

पूर्वी चंपारण जिले के अंतर्गत आने वाले हरसिद्धि और पहाड़पुर प्रखंड के इलाकों में इन दिनों चिरचिरा की खेती बड़े पैमाने पर की जा रही है। विशेष रूप से पहाड़पुर प्रखंड के अंतर्गत आने वाले बलुआ गांव के रहने वाले प्रगतिशील किसान चंद्रेश्वर प्रसाद पिछले कई वर्षों से इस अनोखी सब्जी की खेती का काम सफलतापूर्वक कर रहे हैं। उनके द्वारा उपजाई जा रही इस सब्जी की मांग स्थानीय स्तर पर काफी अधिक है।

किसान चंद्रेश्वर प्रसाद का इस खेती को लेकर अपना एक लंबा अनुभव है। उनका कहना है कि चिरचिरा की खेती करना कोई बहुत जटिल या बेहद मुश्किल काम नहीं है। यदि किसान थोड़ी सी सावधानी और सही तकनीक का इस्तेमाल करें, तो इससे बेहद शानदार मुनाफा कमाया जा सकता है। उन्होंने बताया कि इस फसल को उगाने की पूरी प्रक्रिया काफी हद तक नेनुआ और लौकी की पारंपरिक खेती से मिलती-जुलती है। इसके लिए सबसे पहले खेतों को अच्छी तरह तैयार किया जाता है और फिर पौधों को सहारा देने के लिए मजबूत बांस का मचान बनाया जाता है। इसी मचान पर चिरचिरा की बेलें धीरे-धीरे ऊपर चढ़ती हैं और फैलती हैं, जिससे बाद में लंबे-लंबे फल नीचे की ओर लटकने लगते हैं।

खेती के लिए सही समय और सिंचाई का महत्व

इस सब्जी की खेती की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे गर्मी के मौसम में बेहद आसानी से उगाया जा सकता है। किसान चंद्रेश्वर प्रसाद के अनुसार, चिरचिरा की बुआई या रोपाई का काम साल के शुरुआती महीनों यानी फरवरी से लेकर जून के बीच किसी भी समय किया जा सकता है। यह समय इसके पौधों के विकास के लिए सबसे अनुकूल माना जाता है।

रोपाई का काम पूरा होने के ठीक दो महीने के भीतर पौधों में फूल और फल आने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। एक बार जब पौधों में फल लगने शुरू हो जाते हैं, तो लगातार अगले दो से तीन महीने तक इसकी नियमित तुड़ाई की जा सकती है। इससे किसानों को लगातार और लंबे समय तक फसल की पैदावार मिलती रहती है। हालांकि, इस खेती में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि खेतों में नमी का स्तर सही होना चाहिए। अच्छी और भरपूर पैदावार हासिल करने के लिए समय-समय पर खेतों की सिंचाई करना अनिवार्य होता है। अगर मिट्टी में पर्याप्त नमी बनी रहे, तो बेलों में फलों की संख्या काफी बढ़ जाती है।

स्वाद में अनोखी और भरवा बनाने के लिए सबसे उपयुक्त

चिरचिरा का स्वाद स्थानीय लोगों के बीच बेहद लोकप्रिय है। इस सब्जी का स्वाद लेने वाले लोगों का कहना है कि खाने में यह काफी हद तक साधारण नेनुआ जैसी ही महसूस होती है, लेकिन इसके बावजूद इसका अपना एक अलग और अनूठा स्वाद होता है। ग्रामीण इलाकों में इस सब्जी को विशेष रूप से गरम मसालों का उपयोग करके बेहद स्वादिष्ट तरीके से पकाया जाता है।

इस सब्जी की सबसे अनोखी शारीरिक बनावट यह होती है कि यह अंदर से पूरी तरह खोखली होती है। अंदरूनी हिस्से के खोखले होने के कारण ही इसका उपयोग भरवा सब्जी बनाने के लिए बहुत ज्यादा किया जाता है। जिस तरह लोग बड़े चाव से भरवां करेला या भरवां परवल खाना पसंद करते हैं, ठीक उसी तरह ग्रामीण क्षेत्रों के घरों में भरवां चिरचिरा भी बेहद चाव से खाया और परोसा जाता है। जब खेत में फसल पूरी तरह तैयार हो जाती है, तो मचान से लटकते हुए हरे-भरे लंबे फल देखने में भी बेहद आकर्षक लगते हैं। अपने इसी अनोखे आकार, बेहतरीन स्वाद और बहुउपयोगी गुणों के कारण यह सब्जी बाजार में उपलब्ध अन्य आम सब्जियों की तुलना में अपनी एक बहुत ही विशिष्ट पहचान रखती है।

ग्रामीण बाजारों में जबरदस्त मांग और अच्छी कमाई

हालांकि यह सच है कि बड़े शहरों के आधुनिक बाजारों या मॉल में चिरचिरा जैसी पारंपरिक और देसी सब्जियां बहुत कम देखने को मिलती हैं, लेकिन ग्रामीण और स्थानीय बाजारों में इसकी मांग बेहद मजबूत बनी हुई है। यही प्रमुख कारण है कि पूर्वी चंपारण जिले के अनेक किसान अब पारंपरिक खेती की जगह चिरचिरा उगाने को प्राथमिकता दे रहे हैं। इस खेती से उन्हें न केवल कम लागत में बंपर पैदावार मिल रही है, बल्कि बाजार में इसके अच्छे दाम मिलने से उनकी आर्थिक स्थिति में भी बड़ा सुधार देखने को मिल रहा है।

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