मध्य प्रदेश का बालाघाट जिला अपने घने जंगलों और अनमोल प्राकृतिक संपदा के लिए देश भर में जाना जाता है। इन जंगलों में रहने वाले आदिवासी परिवारों के जीवनयापन का मुख्य साधन यही प्राकृतिक वनोपज है। जून और जुलाई के महीनों में, जब मानसून आने की तैयारी होती है, यहाँ के जंगलों में एक अलग ही रौनक और हलचल देखने को मिलती है। रात के अंधेरे में टिमटिमाते तारों की छांव में आदिवासियों की टोलियां जंगल की ओर निकल पड़ती हैं। इस मौसम में महुआ के पेड़ों से गिरने वाली गुल्ली यानी महुआ के फल का बीज इन परिवारों के लिए किसी छिपे हुए खजाने से कम नहीं होती। सुबह की पहली किरण फूटने से पहले ही आदिवासी बेखौफ होकर जंगल के भीतर चले जाते हैं ताकि वे अधिक से अधिक मात्रा में गुल्ली एकत्र कर सकें।
महुआ का फूल ही नहीं, गुल्ली भी है अमूल्य खजाना
आमतौर पर लोग महुआ के केवल फूलों के बारे में ही जानते हैं, जिनका संग्रह गर्मियों के दिनों में किया जाता है। लेकिन बालाघाट के वनांचलों में रहने वाले आदिवासी समुदायों के लिए महुआ का पेड़ साल के बारह महीने आजीविका का साधन बना रहता है। गर्मी के मौसम में महुआ के फूल बीनकर अपनी रोजी-रोटी चलाने वाले ये ग्रामीण मानसून के आते ही इसके फलों यानी गुल्ली के संग्रहण में जुट जाते हैं। बारिश की फुहारें पड़ते ही महुआ के फल पककर स्वतः ही जमीन पर गिरने लगते हैं। इन गिरे हुए फलों को बटोरकर सुखाना और फिर उनके बीजों को बाजार में बेचना स्थानीय लोगों की वार्षिक आय का एक बड़ा जरिया बन जाता है। इससे होने वाली कमाई से ये लोग बारिश के दिनों के अपने घरेलू खर्चों का इंतजाम करते हैं।
चमगादड़ कैसे बनते हैं आदिवासियों के मददगार?
इस गुल्ली संग्रहण की प्रक्रिया में प्रकृति का एक बेहद दिलचस्प और अनोखा पहलू सामने आता है, जिसमें चमगादड़ आदिवासियों के अनजाने मददगार बन जाते हैं। ग्रामीण अक्सर रात के सन्नाटे में ही गुल्ली इकट्ठा करने के लिए क्यों निकल पड़ते हैं, इसके पीछे एक व्यावहारिक कारण है। दरअसल, रात के समय चमगादड़ महुआ के पेड़ों पर बेहद सक्रिय हो जाते हैं। वे महुआ के मीठे फलों को खाने के लिए पेड़ों पर बैठते हैं। चमगादड़ फल के ऊपरी गूदे वाले हिस्से को खाकर उसके भीतर मौजूद सख्त बीज यानी गुल्ली को नीचे जमीन पर गिरा देते हैं। रात के समय जंगल में गिरने वाले इन बीजों को सबसे पहले पाने की स्थानीय लोगों में होड़ मची रहती है। सुबह होने तक अगर देर की जाए, तो दूसरे ग्रामीण इन्हें उठा ले जाते हैं। यही वजह है कि ग्रामीण रात के घने अंधेरे में ही टॉर्च की रोशनी के सहारे जंगल की ओर दौड़ पड़ते हैं ताकि वे चमगादड़ों द्वारा गिराए गए ताजे बीजों को सबसे पहले समेट सकें।
मेहनत से भरा है बीज निकालने का अनोखा तरीका
जंगल से गुल्ली बीनकर घर लाना तो केवल इस प्रक्रिया का आधा हिस्सा है। असली मेहनत तो दिन के समय घर के आंगन में शुरू होती है। महुआ की गुल्ली का ऊपरी छिलका बेहद सख्त होता है। इस सख्त आवरण से बीज को अलग करना बेहद थका देने वाला और कठिन काम माना जाता है। इसके लिए स्थानीय ग्रामीण एक बहुत ही अनूठा पारंपरिक तरीका अपनाते हैं। वे गुल्ली के ऊपर एक भारी पत्थर रखते हैं और फिर अपने पैर की मदद से उस पत्थर को दबाते हुए गोल-गोल घुमाते हैं। दूर से देखने पर ऐसा प्रतीत होता है मानो वे पत्थर के ऊपर खड़े होकर कोई नृत्य कर रहे हों। घंटों की इस कठिन शारीरिक मशक्कत और पारंपरिक जुगत के बाद ही गुल्ली का कड़ा छिलका टूटता है और उसके अंदर का कीमती बीज सुरक्षित बाहर निकल पाता है। इस काम में परिवार के सभी सदस्य, जिनमें महिलाएं और बच्चे भी शामिल होते हैं, अपना पूरा सहयोग देते हैं।
बाजार में कीमत और बिचौलियों का मकड़जाल
महुआ के पेड़ आकार में काफी बड़े और घने होते हैं। इनकी बड़ी-बड़ी शाखाओं के कारण एक-एक पेड़ से कई क्विंटल तक गुल्ली प्राप्त हो जाती है। ये पेड़ केवल सरकारी जंगलों तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि ग्रामीणों के निजी खेतों की मेढ़ों पर भी बहुतायत में पाए जाते हैं। स्थानीय बाजार में महुआ की यह गुल्ली 25 से 30 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से बिकती है। इस बिक्री से होने वाली आमदनी ग्रामीणों को बारिश के मौसम में घरेलू खर्चों और कृषि कार्यों के लिए आवश्यक खाद-बीज खरीदने में मदद करती है। हालांकि, इस व्यापार में बिचौलियों का बड़ा दखल रहता है। ग्रामीण क्षेत्रों में सक्रिय दलाल सीधे-साधे आदिवासियों से बेहद कम दामों पर ये गुल्लियां खरीद लेते हैं और बाद में उन्हें बड़े शहरों के बड़े व्यापारियों को ऊंचे दामों पर बेचकर मोटा मुनाफा कमाते हैं। स्थानीय निवासियों का कहना है कि यदि सरकार इस वनोपज के संग्रहण और खरीद के लिए उचित सरकारी केंद्र स्थापित करे, तो न केवल आदिवासियों को उनकी कड़ी मेहनत का सही मूल्य मिलेगा बल्कि उनके अधिकारों का संरक्षण भी सुनिश्चित होगा।
गुल्ली के बहुपयोगी फायदे: तेल से लेकर खाद तक
महुआ की इस गुल्ली को स्थानीय भाषा में डोरी या डोलिया भी कहा जाता है। इसके औषधीय और व्यावसायिक उपयोग बेहद व्यापक हैं। गुल्ली से निकलने वाले तेल का उपयोग खाना पकाने के लिए खाद्य तेल के रूप में किया जा सकता है। आयुर्वेदिक दृष्टि से यह तेल वात नाशक और गर्म तासीर का होता है। यही कारण है कि मांसपेशियों में खिंचाव, जोड़ों के दर्द और गठिया जैसी गंभीर समस्याओं में इस तेल से मालिश करना अत्यंत लाभकारी माना जाता है। इसके अतिरिक्त, सौंदर्य प्रसाधन और चॉकलेट उद्योग में इसका उपयोग कोको बटर के विकल्प के तौर पर भी किया जाता है। तेल निकालने के बाद बचने वाले हिस्से यानी गुल्ली की खली का उपयोग एक बेहतरीन और अत्यंत प्रभावकारी जैविक खाद बनाने के लिए किया जाता है, जो फसलों की पैदावार बढ़ाने में बेहद सहायक सिद्ध होती है।
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