क्या कांग्रेस में हाशिए पर जा रहे हैं दिग्विजय सिंह? पार्टी लाइन से अलग सुर अलापने के पीछे क्या है दिग्गी राजा की असली रणनीति?

मध्य प्रदेश कांग्रेस में मुख्यमंत्री मोहन यादव के खिलाफ भूमि आवंटन विवाद को लेकर जारी घमासान के बीच, पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के विरोधाभासी बयानों ने पार्टी को असमंजस में डाल दिया है। इस राजनीतिक खींचतान ने कांग्रेस के भीतर नए और पुराने नेतृत्व के टकराव को एक बार फिर सतह पर ला दिया है।

मध्य प्रदेश के राजनैतिक गलियारों में इन दिनों एक ऐसा अभूर्व और हैरान करने वाला दृश्य देखने को मिल रहा है, जिसने राजनीतिक विश्लेषक और आम जनता दोनों को सोचने पर मजबूर कर दिया है। जिस राजनेता को भारतीय जनता पार्टी पिछले लगभग दो दशकों से सूबे में अपना सबसे बड़ा और नंबर वन टारगेट मानती रही है, आज अचानक उसी नेता के लिए सत्ताधारी दल के सुर पूरी तरह से बदले-बदले नजर आ रहे हैं। मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह की हालिया बयानबाजी के बाद भाजपा के कई प्रमुख नेता न केवल उनके समर्थन में खड़े दिखाई दे रहे हैं, बल्कि उनके प्रति सहानुभूति भी जता रहे हैं। लेकिन विरोधियों से मिल रही यह अनपेक्षित सहानुभूति खुद दिग्विजय सिंह के लिए कांग्रेस पार्टी के भीतर एक बहुत बड़े राजनैतिक संकट का कारण बन गई है। अपनी ही पार्टी के नेताओं, पदाधिकारियों और जमीनी कार्यकर्ताओं के सीधे निशाने पर आए दिग्विजय सिंह इस समय चौतरफा भारी दबाव में घिरे हुए हैं। इस पूरे घटनाक्रम ने राज्य के राजनीतिक हलकों में इस चर्चा को बेहद गर्म कर दिया है कि क्या दिग्विजय सिंह की कांग्रेस से छुट्टी होने वाली है? और इससे भी बड़ा गंभीर सवाल यह उठ रहा है कि आखिर दिग्विजय सिंह बार-बार पार्टी की आधिकारिक लाइन से बिल्कुल अलग जाकर इस तरह के बयान क्यों दे रहे हैं, जिससे उनकी अपनी ही पार्टी बैकफुट पर जाने के लिए मजबूर हो जाती है?

उज्जैन के वीर भारत न्यास मामले से सुलगी विवाद की चिंगारी

इस पूरे विवाद की ठोस बुनियाद जून 2026 के आखिरी हफ्ते में पड़ी थी, जब उज्जैन के बहुचर्चित वीर भारत न्यास की जमीन के हस्तांतरण के मामले को लेकर मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने सीधे राज्य के मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव के खिलाफ एक बेहद आक्रामक मोर्चा खोल दिया था। कांग्रेस ने इस मामले को राष्ट्रीय स्तर पर उठाने की योजना बनाई और दिल्ली में बकायदा एक बड़ी प्रेस कॉन्फ्रेंस का आयोजन किया गया। इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में मध्य प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष जीतू पटवारी और कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता पवन खेड़ा ने संयुक्त रूप से मुख्यमंत्री और उनके परिवार पर बेहद गंभीर और सनसनीखेज आरोप मढ़े थे। उन्होंने आरोप लगाया था कि मुख्यमंत्री के परिवार से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ी कुछ रियल एस्टेट कंपनियों को करोड़ों रुपये का फायदा पहुंचाने के उद्देश्य से लगभग 500 करोड़ रुपये मूल्य की बेशकीमती और बहुमूल्य सरकारी जमीन को महज 1 रुपये के टोकन मूल्य पर एक निजी ट्रस्ट को सौंप दिया गया है। कांग्रेस इस पूरे मुद्दे को लेकर बहुत उत्साहित थी और उसे लग रहा था कि उसने सरकार को घेरने के लिए एक बहुत बड़ा और अचूक हथियार हासिल कर लिया है। पार्टी इस आक्रामक मुद्दे को लेकर विधानसभा से लेकर सड़क तक एक बड़ा आंदोलन खड़ा करने की तैयारी कर रही थी।

दिग्विजय सिंह का 'फैक्ट-चेक' और कांग्रेस की किरकिरी

लेकिन कांग्रेस की यह राजनीतिक योजना ज्यादा दिनों तक परवान नहीं चढ़ सकी। इस प्रेस कॉन्फ्रेंस के मात्र दो दिन बाद ही वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने इस पूरे नैरेटिव की पूरी तरह से हवा निकाल दी और अपनी ही पार्टी की किरकिरी करा दी। दिग्विजय सिंह ने मीडिया के सामने आकर बेबाक तरीके से कह दिया कि उनके पास मौजूद आधिकारिक और प्रामाणिक दस्तावेजों के मुताबिक यह विवादित जमीन किसी निजी ट्रस्ट की नहीं, बल्कि एक सरकारी ट्रस्ट की है, जिसके प्रमुख पदेन रूप से स्वयं राज्य के मुख्यमंत्री हैं। दिग्विजय सिंह यहीं नहीं रुके, उन्होंने बिना पूरी तैयारी और अधूरी रिसर्च के इस तरह के गंभीर मुद्दों पर बात करने वालों को 'दलालों' की श्रेणी में रखने जैसा तल्ख बयान भी दे डाला। दिग्विजय सिंह का अपनी ही पार्टी के शीर्ष नेतृत्व और प्रदेश अध्यक्ष के स्टैंड के खिलाफ जाकर सरेआम खड़ा होना कांग्रेस के भीतर एक जबरदस्त राजनीतिक विस्फोट की तरह था, जिसने पूरी पार्टी को जनता के सामने असहज स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया।

कांग्रेस का अंदरूनी गृहयुद्ध और 'नागपाश' से मुक्ति की मांग

इस बयान के बाद जहां एक तरफ प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी और उनके समर्थक अपने आरोपों पर पूरी तरह अड़े रहे और खुद को सही साबित करने में जुटे रहे, वहीं दूसरी तरफ पार्टी के अंदरूनी हलकों में इस बात को लेकर सुगबुगाहट और रोष बहुत तेज हो गया कि दिग्विजय सिंह ने सरेआम प्रदेश अध्यक्ष की साख और नेतृत्व क्षमता पर बट्टा लगा दिया है। इसके तुरंत बाद जब भोपाल में कांग्रेस की पॉलिटिकल अफेयर्स कमेटी की एक अत्यंत महत्वपूर्ण बैठक आयोजित हुई, तो यह अंदरूनी दरार पूरी तरह से सतह पर आ गई। बैठक के बंद कमरों में कई नेताओं ने दिग्विजय सिंह के इस रवैए पर बेहद कड़ा ऐतराज जताया और अपनी नाराजगी व्यक्त की। उनका साफ तौर पर कहना था कि यदि दिग्विजय सिंह के पास भूमि आवंटन से जुड़े दस्तावेजों में कोई अंतर था या उन्हें पार्टी के दावों पर कोई संदेह था, तो उन्हें इसे मीडिया में ले जाने के बजाय पार्टी के आंतरिक मंच पर उठाना चाहिए था।

इस विवाद की आग को और अधिक भड़काने का काम पूर्व सांसद सत्यव्रत चतुर्वेदी की बेटी और कांग्रेस महासचिव निधि चतुर्वेदी के एक सोशल मीडिया पोस्ट ने किया। निधि चतुर्वेदी ने बिना किसी लाग-लपेट के सीधे तौर पर यह तीखा सवाल दाग दिया कि दिग्विजय सिंह के इस 'नागपाश' से कांग्रेस पार्टी को आखिरकार कब मुक्ति मिलेगी? निधि चतुर्वेदी का यह कड़ा रुख साफ तौर पर दर्शाता है कि कांग्रेस पार्टी का एक बहुत बड़ा और नया धड़ा अब दिग्विजय सिंह की इस बेबाक और स्वतंत्र कार्यशैली से बुरी तरह तंग आ चुका है और उन्हें संगठन के आगे बढ़ने की राह में एक बड़ा रोड़ा मानने लगा है।

भाजपा की तरफ से न्योता और कांग्रेस का तीखा पलटवार

कांग्रेस के इस घरेलू झगड़े और अंदरूनी कलह का राजनीतिक लाभ उठाने के लिए भारतीय जनता पार्टी ने भी जरा सी भी देर नहीं की। भाजपा के विधायक प्रीतम लोधी ने तो इस बहती गंगा में हाथ धोते हुए दिग्विजय सिंह को अपनी ही पार्टी को छोड़कर भाजपा का दामन थामने का एक सीधा और खुला न्योता दे डाला। प्रीतम लोधी ने सार्वजनिक रूप से बयान दिया कि यदि दिग्विजय सिंह कांग्रेस का साथ छोड़कर भाजपा में शामिल होते हैं, तो भाजपा में उनकी वरिष्ठता और अनुभव का पूरा सम्मान किया जाएगा और उन्हें एक बहुत ही आदरणीय स्थान दिया जाएगा। इस बयान के बाद राजनीतिक हलकों में इन कयासों को और बल मिला कि क्या दिग्विजय सिंह की वाकई में कांग्रेस से विदाई होने वाली है?

इस पूरे घटनाक्रम और भाजपा के आमंत्रण पर कांग्रेस की तरफ से भी तुरंत पलटवार किया गया। कांग्रेस के मुख्य प्रवक्ता रवि सक्सेना ने बहुत आक्रामक तरीके से प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि दिग्विजय सिंह का डीएनए पूरी तरह से और जन्मजात रूप से कांग्रेस पार्टी से जुड़ा हुआ है। रवि सक्सेना ने दिग्विजय सिंह को पार्टी का सबसे वफादार और मजबूत सिपाही करार देते हुए कहा कि वह एक ऐसे कद्दावर नेता हैं, जिनकी नीतियों और आक्रामकता से पूरी भाजपा हमेशा थरथर कांपती है। इसलिए भाजपा नेताओं को दिग्विजय सिंह के पाला बदलने के मुंगेरीलाल के हसीन सपने देखना तुरंत बंद कर देना चाहिए, क्योंकि ऐसा कभी नहीं होने वाला है।

आखिरकार पार्टी लाइन से अलग क्यों जा रहे हैं दिग्विजय सिंह?

राजनीतिक विश्लेषक और मध्य प्रदेश की राजनीति को करीब से जानने वाले विशेषज्ञ दिग्विजय सिंह के इस हैरान करने वाले रुख के पीछे कई गहरे राजनैतिक और व्यक्तिगत कारण मान रहे हैं, जिन्हें निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से समझा जा सकता है:

  • वर्चस्व और अस्तित्व को बनाए रखने की गंभीर लड़ाई: वर्तमान समय में मध्य प्रदेश कांग्रेस के भीतर एक बहुत बड़ा पीढ़ीगत और नेतृत्व परिवर्तन देखने को मिल रहा है। पार्टी हाईकमान ने जीतू पटवारी के रूप में एक युवा और आक्रामक नेता को प्रदेश की कमान सौंपी है। ऐसे में दिग्विजय सिंह द्वारा अपनी ही पार्टी के दावों का इस प्रकार 'फैक्ट-चेक' करना असल में नए नेतृत्व के सामने अपने पुराने और स्थापित राजनीतिक वर्चस्व को बचाए रखने की एक छटपटाहट हो सकती है, ताकि पार्टी में उनकी पूछ हमेशा बनी रहे।
  • बदली हुई राजनीतिक परिस्थितियां और संसदीय पद का अभाव: पिछले कुछ समय में हुए चुनावों में लगातार मिली हार के बाद दिग्विजय सिंह के पास वर्तमान में कोई भी संवैधानिक, संसदीय या महत्वपूर्ण प्रशासनिक पद नहीं बचा है। संसद से बाहर होने के बाद पार्टी संगठन के भीतर खुद को प्रासंगिक और चर्चा में बनाए रखने के लिए वे अपने इसी स्वतंत्र, बेबाक और कभी-कभी आक्रामक स्वभाव का सहारा ले रहे हैं, जिससे वे लगातार सुर्खियों में बने रहें।
  • तथ्यों और गंभीर शोध के प्रति उनका झुकाव: दिग्विजय सिंह को राजनीति में एक बेहद गंभीर और दस्तावेजों का बारीकी से अध्ययन करने वाले नेता के रूप में जाना जाता है। कई बार वे पार्टी के तात्कालिक राजनीतिक नफा-नुकसान को पूरी तरह से दरकिनार कर अपने खुद के जुटाए गए तथ्यों पर अड़ जाते हैं, भले ही इसके कारण पार्टी की छवि को कितना भी बड़ा धक्का क्यों न पहुंचे। वे अपनी इस छवि को राजनीतिक प्रतिबद्धता से ऊपर रखना पसंद करते हैं।

क्या वाकई कांग्रेस हाईकमान दिग्विजय सिंह पर कोई कड़ा कदम उठाएगा?

इस पूरे विवाद का यदि एक निष्पक्ष, तटस्थ और व्यावहारिक विश्लेषण किया जाए, तो कुछ बातें बिल्कुल शीशे की तरह साफ नजर आती हैं। दिग्विजय सिंह जैसे कद्दावर, वरिष्ठ और राष्ट्रीय स्तर के नेता, जिनका पूरा राजनीतिक जीवन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा विरोधी नीतियों की मुखालफत पर केंद्रित रहा है, उन्हें सीधे पार्टी से बर्खास्त करना या बाहर का रास्ता दिखाना कांग्रेस के लिए बेहद आत्मघाती कदम साबित हो सकता है। राज्य के जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं और पुराने सांगठनिक ढांचे में उनका नेटवर्क आज भी अत्यंत मजबूत और प्रभावी है, जिसे नजरअंदाज करना पार्टी के लिए मुमकिन नहीं है।

इस विश्लेषण से यह स्पष्ट निष्कर्ष निकलता है कि दिग्विजय सिंह की कांग्रेस से तत्काल छुट्टी होने की संभावना बेहद कम या न के बराबर है। लेकिन इस बार उन्होंने अपनी ही पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष के खिलाफ जो मोर्चा खोला है, उसने पार्टी के भीतर उनके बचे-खुचे राजनैतिक प्रभाव को काफी हद तक संकुचित और सीमित अवश्य कर दिया है। वर्तमान में भाजपा इस अंतर्कलह का पूरा राजनीतिक फायदा उठाने की फिराक में है, जबकि कांग्रेस अपनी बिखरती हुई एकता को किसी भी तरह से बचाने की जद्दोजहद में लगी हुई है। दूसरी ओर, स्वयं दिग्विजय सिंह ने भी अपने बयानों से फैले इस पूरे रायते को समेटने और डैमेज कंट्रोल करने की कोशिशें तेज कर दी हैं, जिसके तहत उन्होंने बाद में जीतू पटवारी को अपने बेटे की तरह बताते हुए उनके स्टैंड को सही ठहराने का प्रयास भी किया है, ताकि पार्टी के भीतर बढ़ते आक्रोश को किसी तरह शांत किया जा सके।

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