ज्ञान प्राप्त करने की कोई तय सीमा नहीं होती और न ही सीखने के लिए उम्र का कोई बंधन होता है। इस बात को एक बार फिर पूरी तरह सच साबित कर दिखाया है हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले के रहने वाले 75 वर्षीय मिल्खी राम ने। आज के समय में जहां कई युवा बहुत छोटी-छोटी मुश्किलों या जीवन की परिस्थितियों के सामने घुटने टेक देते हैं और अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ देते हैं, वहीं मिल्खी राम ने इस सामान्य धारणा को पूरी तरह बदल कर रख दिया है। 32 डिग्रियां और हिंदी विषय में पीएचडी हासिल करने के बाद भी शिक्षा के प्रति उनका लगाव जरा भी कम नहीं हुआ है। उनके भीतर सीखने की ललक आज भी वैसी ही बनी हुई है जैसी किसी युवा छात्र में होती है।
वर्तमान में मिल्खी राम इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (IGNOU) से संस्कृत विषय में 'आचार्य' की परीक्षा दे रहे हैं। शिक्षा के प्रति उनका यह अनूठा समर्पण और कठिन परिश्रम न केवल हिमाचल बल्कि पूरे देश के युवाओं के लिए एक बेमिसाल उदाहरण बन गया है। जब वह परीक्षा देने केंद्र पर पहुंचते हैं, तो उनकी ऊर्जा और उत्साह को देखकर वहां मौजूद हर व्यक्ति दंग रह जाता है।
उम्र के इस पड़ाव पर भी थमा नहीं शिक्षा का सफर
जब मिल्खी राम हमीरपुर स्थित IGNOU के अध्ययन केंद्र में परीक्षा देने के लिए पहुंचे, तो वहां मौजूद हर शख्स हैरान रह गया। 75 वर्ष की उम्र में भी परीक्षा कक्ष में बैठकर परीक्षा लिखने की उनकी इच्छाशक्ति ने वहां मौजूद परीक्षा केंद्र के अधिकारियों और अन्य युवा परीक्षार्थियों को गहराई से प्रभावित किया। मिल्खी राम इस परीक्षा केंद्र पर परीक्षा देने वाले सबसे अधिक उम्र के परीक्षार्थी हैं।
आमतौर पर लोग नौकरी से सेवानिवृत्त होने के बाद आराम का जीवन बिताना पसंद करते हैं, लेकिन मिल्खी राम का जीवन पूरी तरह अलग रहा है। उनके लिए सेवानिवृत्ति केवल नौकरी से हुई थी, ज्ञान अर्जित करने के मार्ग से नहीं। उनका मानना है कि जब तक शरीर और दिमाग साथ दे रहे हैं, तब तक इंसान को नया ज्ञान प्राप्त करने का प्रयास करते रहना चाहिए। यही वजह है कि 75 वर्ष की आयु में भी वे पूरी गंभीरता के साथ परीक्षा की तैयारी करते हैं और परीक्षा कक्ष में जाकर प्रश्नों के उत्तर लिखते हैं।
सरकारी नौकरी के साथ-साथ जारी रखी पढ़ाई
मिल्खी राम के इस असाधारण सफर की शुरुआत बहुत ही सामान्य तरीके से हुई थी। उनका जन्म 10 फरवरी 1952 को हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले के अंतर्गत आने वाले गांदर गांव में हुआ था। एक मध्यमवर्गीय पृष्ठभूमि से आने के कारण उन पर पारिवारिक जिम्मेदारियां भी थीं। उन्होंने वर्ष 1972 में वन विभाग में एक सामान्य कर्मचारी के रूप में नौकरी की शुरुआत की थी।
हालांकि, नौकरी शुरू होने के बाद भी उन्होंने शिक्षा को कभी पीछे नहीं छोड़ा। उन्होंने काम के साथ-साथ अपनी पढ़ाई को जारी रखने का दृढ़ संकल्प लिया। वर्ष 1976 में उन्होंने धर्मशाला के एक निजी महाविद्यालय से स्नातक की डिग्री प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने नौकरी के दायित्वों, पारिवारिक जिम्मेदारियों और सामाजिक कार्यों को बखूबी संभालते हुए अपनी पढ़ाई के सफर को लगातार आगे बढ़ाया।
जब वर्ष 2010 में वह वन विभाग से ग्रेड-1 अधिकारी के पद से सेवानिवृत्त हुए, तो उस समय तक उनके पास कुल 26 डिग्रियां थीं। सेवानिवृत्ति के बाद जहां लोग अपने शेष जीवन को शांति से बिताते हैं, वहीं मिल्खी राम ने पढ़ाई की गति को और तेज कर दिया। परिणामस्वरूप, सेवानिवृत्ति के बाद के वर्षों में उन्होंने 6 और डिग्रियां हासिल कीं, जिससे उनकी कुल डिग्रियों की संख्या बढ़कर 32 हो गई।
डिग्रियों की लंबी सूची: पीएचडी से लेकर एमबीए और एलएलबी तक
मिल्खी राम की शैक्षणिक उपलब्धियों और डिग्रियों की सूची इतनी लंबी है कि इसे देखकर कोई भी व्यक्ति चकित रह सकता है। उनके पास शिक्षा और ज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों की डिग्रियां मौजूद हैं। उनकी कुछ प्रमुख शैक्षणिक डिग्रियों में शामिल हैं:
- बीएड और प्रभाकर की उपाधि
- कानून की पढ़ाई के लिए एलएलबी (LLB) की डिग्री
- पत्रकारिता और जनसंचार (JMC) में डिग्री
- संस्कृत विषय में स्नातक (BA)
- हिंदी, राजनीति विज्ञान, समाजशास्त्र, इतिहास, अंग्रेजी और अर्थशास्त्र जैसे विविध विषयों में स्नातकोत्तर (MA) की डिग्रियां
- व्यावसायिक शिक्षा के अंतर्गत एमबीए (MBA)
- शोध के क्षेत्र में एमफिल (M.Phil)
- हिंदी विषय में सर्वोच्च शैक्षणिक उपाधि पीएचडी (PhD)
इतनी सारी डिग्रियों को अपने नाम करने के बाद अब मिल्खी राम IGNOU से संस्कृत में 'आचार्य' की उपाधि हासिल करने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं। गौरतलब है कि IGNOU में 'आचार्य' की इस डिग्री को संस्कृत में स्नातकोत्तर (MA Sanskrit) के समकक्ष माना जाता है। अपनी इस नई डिग्री के साथ वह अपनी विशाल शैक्षणिक सूची में एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि जोड़ने की ओर अग्रसर हैं।
IGNOU के परीक्षा केंद्र पर बना कौतूहल और सम्मान का केंद्र
इस समय मिल्खी राम हमीरपुर स्थित IGNOU स्टडी सेंटर से संस्कृत 'आचार्य' की परीक्षाएं दे रहे हैं। परीक्षा केंद्र पर उनकी उपस्थिति चर्चा का मुख्य विषय बनी हुई है। परीक्षा केंद्र के प्रभारी प्रोफेसर संजय कुमार ने मिल्खी राम के बारे में बात करते हुए कहा कि 75 वर्ष की आयु में परीक्षा देने पहुंचे मिल्खी राम इस केंद्र के सबसे वरिष्ठ और आदरणीय परीक्षार्थी हैं।
प्रोफेसर संजय कुमार के अनुसार, परीक्षा केंद्र प्रशासन मिल्खी राम की इस अनूठी भावना और शिक्षा के प्रति उनके बेजोड़ समर्पण से बेहद प्रभावित हुआ। उनके इस जज्बे का सम्मान करने के लिए परीक्षा केंद्र पर खुद प्रभारी और अन्य स्टाफ सदस्यों ने उन्हें फूलों का गुलदस्ता भेंट कर उनका भव्य स्वागत किया। परीक्षा देने आए अन्य युवा छात्रों के लिए भी मिल्खी राम एक मार्गदर्शक की तरह नजर आते हैं।
पारिवारिक सहयोग बना सफलता का सबसे बड़ा आधार
अपनी इस अद्भुत सफलता और शिक्षा के सफर को लगातार जारी रखने के पीछे मिल्खी राम अपने परिवार के अटूट सहयोग को सबसे महत्वपूर्ण मानते हैं। वह विशेष रूप से अपनी पत्नी विद्या देवी को अपनी इस सफलता का सबसे बड़ा श्रेय देते हैं। विद्या देवी स्वयं भी वन विभाग में ग्रेड-1 अधिकारी के पद से सेवानिवृत्त हो चुकी हैं, इसलिए वह शिक्षा और करियर के महत्व को बहुत अच्छी तरह समझती हैं।
मिल्खी राम का परिवार भी शैक्षणिक और प्रशासनिक रूप से काफी सफल है। उनका बेटा राकेश कुमार भारतीय रेलवे में रेल मंत्रालय के अधीन एक प्रतिष्ठित IRTS अधिकारी के रूप में अपनी सेवाएं दे रहा है। मिल्खी राम का कहना है कि उनकी पत्नी, बेटे और बहू ने कभी भी उनके इस फैसले पर सवाल नहीं उठाया, बल्कि हमेशा उन्हें आगे बढ़ने और अपनी पढ़ाई को जारी रखने के लिए प्रेरित व प्रोत्साहित किया। उन्होंने यह भी बताया कि हाल ही में उन्होंने अपनी आंखों का इलाज भी करवाया था ताकि बढ़ती उम्र की वजह से उनकी पढ़ाई और परीक्षा की तैयारियों में किसी भी तरह का कोई व्यवधान उत्पन्न न हो।
बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर हैं जीवन के आदर्श
जब मिल्खी राम से उनके जीवन की प्रेरणा के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने बहुत गर्व के साथ देश के महान समाज सुधारक और संविधान निर्माता डॉ. भीमराव आंबेडकर का नाम लिया। मिल्खी राम का कहना है कि वे डॉ. आंबेडकर के विचारों और उनके जीवन संघर्ष से बेहद प्रभावित हैं। बाबासाहेब का मानना था कि शिक्षा ही वह माध्यम है जिसके जरिए समाज और व्यक्ति दोनों का वास्तविक कल्याण और विकास सुनिश्चित किया जा सकता है।
मिल्खी राम ने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि ज्ञान दुनिया की एकमात्र ऐसी संपत्ति है जिसे कोई भी आपसे कभी छीन नहीं सकता। धन-दौलत और भौतिक चीजें समय के साथ नष्ट हो सकती हैं, लेकिन अर्जित किया गया ज्ञान जीवन के अंतिम क्षण तक मनुष्य के साथ रहता है। उनका मानना है कि यदि किसी व्यक्ति के भीतर कुछ नया सीखने की इच्छा हमेशा जीवित रहे, तो बढ़ती उम्र कभी भी उसके मार्ग में बाधा नहीं बन सकती। उन्होंने देश के युवाओं से अपील करते हुए कहा कि वे शिक्षा को अपने जीवन में हमेशा प्राथमिकता दें, क्योंकि यही उनका और देश का भविष्य बदलने की सबसे बड़ी ताकत है।
उम्र नहीं, सीखने का जुनून मायने रखता है
हमीरपुर IGNOU स्टडी सेंटर के प्रभारी प्रोफेसर संजय कुमार ने मिल्खी राम की तारीफ करते हुए कहा कि उनकी यह कहानी देश के हर नागरिक को एक नया संदेश देती है। उन्होंने कहा कि सफलता या ज्ञान प्राप्त करने का संबंध किसी विशेष आयु वर्ग से नहीं है, बल्कि यह पूरी तरह से व्यक्ति की सीखने की लगन, उसके अनुशासन और उसके दृढ़ संकल्प पर निर्भर करता है। आज के समय में जब कई युवा बहुत छोटी-छोटी कठिनाइयों से घबराकर अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ देते हैं, ऐसे दौर में मिल्खी राम का यह साहसी कदम समाज में एक बेहद सकारात्मक और ऊर्जावान संदेश भेजता है। वह न केवल एक परीक्षार्थी हैं बल्कि एक जीवंत प्रेरणा हैं जिन्होंने यह साबित किया है कि सीखने की कोई अंतिम सीमा नहीं होती।
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