अदम्य साहस और दृढ़ निश्चय की कहानी
अलवर के रहने वाले 12 साल के प्रतीक ने साबित कर दिया है कि अगर मन में कुछ कर गुजरने की ठान ली जाए, तो कोई भी शारीरिक बाधा सपनों की राह में रोड़ा नहीं बन सकती। जन्म से मूक-बधिर होने के बावजूद प्रतीक ने राइफल शूटिंग के खेल में अपनी एक अलग पहचान बनाई है। यह खेल एकाग्रता और धैर्य का है, और प्रतीक ने अपनी कड़ी मेहनत के दम पर राजस्थान स्टेट शूटिंग चैंपियनशिप में कांस्य पदक हासिल कर पूरे प्रदेश का मान बढ़ाया है। अपनी उम्र के बाकी बच्चों के लिए वह आज एक प्रेरणा का स्रोत बन चुके हैं।
मनु भाकर से मिली शूटिंग की प्रेरणा
प्रतीक के जीवन में शूटिंग का सफर एक दिलचस्प मोड़ से शुरू हुआ। उनके पिता अजय सिंह भारतीय सेना में कार्यरत हैं और देश की सेवा कर रहे हैं। करीब ढाई साल पहले, अजय सिंह घर पर टीवी देख रहे थे और स्क्रीन पर भारतीय स्टार शूटर मनु भाकर को अंतरराष्ट्रीय मंच पर पदक जीतते हुए दिखाया जा रहा था। मनु भाकर को तिरंगे के साथ पोडियम पर देख प्रतीक बेहद प्रेरित हुए। उन्होंने अपनी सांकेतिक भाषा के जरिए अपने पिता से राइफल शूटिंग सीखने की इच्छा व्यक्त की। पिता ने बेटे के इस जज्बे को भांपते हुए उसी दिन उसे अलवर के एक शूटिंग अकादमी में भर्ती कराने का निर्णय ले लिया।
आर्थिक तंगहाली के बावजूद सपनों को दी उड़ान
प्रतीक अभी महज छठी कक्षा में पढ़ाई कर रहे हैं। शूटिंग एक महंगा खेल माना जाता है, जिसमें उपकरणों का खर्च बहुत ज्यादा होता है। शुरुआत में जब उन्होंने शूटिंग की शुरुआत करने का फैसला किया, तो एक नई राइफल की कीमत करीब 3 लाख रुपये थी। मध्यमवर्गीय परिवार से होने के कारण यह राशि जुटाना उनके पिता के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण था। हालांकि, पिता ने अपने बेटे के सपनों को टूटने नहीं दिया। उन्होंने आर्थिक तंगहाली का सामना करते हुए प्रतीक के लिए एक पुरानी यानी सेकंड हैंड राइफल खरीदकर दी। प्रतीक आज भी उसी पुरानी राइफल का उपयोग करके साई शूटिंग रेंज में अपने निशाने को अचूक बनाने के लिए अभ्यास करते हैं। उनका एकमात्र लक्ष्य अंतरराष्ट्रीय स्तर और ओलंपिक में पदक जीतकर देश का नाम रोशन करना है।
कोच परमेंद्र का खास प्रशिक्षण
प्रतीक ने वर्ष 2026 में अलवर के इंदिरा गांधी स्टेडियम स्थित साई शूटिंग रेंज में अपने औपचारिक प्रशिक्षण की शुरुआत की। उनके मुख्य कोच परमेंद्र ने प्रतीक की प्रतिभा की प्रशंसा करते हुए बताया कि उनमें सीखने की तीव्र ललक है। चूंकि प्रतीक सुन नहीं सकते, इसलिए प्रशिक्षण के दौरान कोच उन्हें बेहद सरल और सांकेतिक शब्दों में तकनीकी बारीकियां समझाते हैं। कोच के अनुसार, प्रतीक अपनी सुनने की अक्षमता के कारण बाकी सामान्य बच्चों की तुलना में कहीं अधिक एकाग्रता के साथ संकेतों को समझते हैं और उसे तुरंत लागू करते हैं। यही उनकी सबसे बड़ी ताकत है, जिसकी बदौलत उन्होंने हाल ही में संपन्न हुई राजस्थान स्टेट शूटिंग चैंपियनशिप में शानदार प्रदर्शन करते हुए कांस्य पदक जीता है।
अनुभवी खिलाड़ियों को दे रहे टक्कर
कोच परमेंद्र बताते हैं कि शूटिंग के खेल में आयु सीमा का कोई कड़ा प्रतिबंध नहीं होता है, जिससे युवा खिलाड़ी भी वरिष्ठ श्रेणी के साथ मुकाबला कर सकते हैं। यही वजह है कि 12 वर्ष की आयु में प्रतीक अपने से काफी अधिक उम्र और अनुभवी खिलाड़ियों के सामने प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं। वह हर प्रतियोगिता में अपने सटीक प्रदर्शन से सभी को हैरान कर देते हैं। प्रतीक की दिनचर्या में अनुशासन का बहुत महत्व है। वह प्रतिदिन कम से कम तीन घंटे तक कोच की देखरेख में बेहद एकाग्र होकर अभ्यास करते हैं। उनकी यह मेहनत और खेल के प्रति उनका समर्पण उन्हें भविष्य में एक बड़ा शूटर बनाने की ओर अग्रसर कर रहा है। प्रतीक का यह सफर उन सभी के लिए एक उदाहरण है जो अपनी सीमाओं के कारण खुद को सीमित मानते हैं। अपनी मेहनत और अटूट आत्मविश्वास के बल पर प्रतीक ने यह सिद्ध कर दिया है कि सफलता पाने के लिए सिर्फ संकल्प की जरूरत होती है।
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