आज के समय में पारंपरिक खेती के साथ-साथ पशुपालन का चलन काफी तेजी से बढ़ रहा है। आमतौर पर जब भी पशुपालन व्यवसाय की बात आती है, तो लोगों के दिमाग में सबसे पहले गाय और भैंस का नाम आता है। हालांकि, अगर कम समय में बहुत अधिक और बंपर कमाई करने वाले व्यवसाय की बात की जाए, तो मुर्गी पालन यानी पोल्ट्री फार्मिंग सबसे आगे नजर आता है। लेकिन इस व्यवसाय में जितनी ज्यादा कमाई की संभावना है, उतना ही बड़ा जोखिम भी छिपा हुआ है। उचित तकनीकी और वैज्ञानिक जानकारी के अभाव में शुरुआत करने वाले किसानों को कई बार भारी आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ जाता है।
इसी समस्या को ध्यान में रखते हुए बेगूसराय के कृषि विज्ञान केंद्र के पशु चिकित्सा विज्ञान विशेषज्ञ डॉ. विपिन कुमार ने मुर्गी पालन को लेकर कुछ बेहद महत्वपूर्ण वैज्ञानिक तरीके और दिशा-निर्देश साझा किए हैं। उनका मानना है कि पोल्ट्री व्यवसाय को सुरक्षित और लाभदायक बनाने के लिए शुरुआत से ही वैज्ञानिक मानकों का सख्ती से पालन करना चाहिए। सही व्यवस्था और प्रबंधन से न केवल मुर्गियों का उत्पादन बेहतर होता है, बल्कि बीमारियों का खतरा भी काफी हद तक कम हो जाता है।
मुर्गियों की नस्ल के अनुसार जगह का सही चुनाव
डॉ. विपिन कुमार के अनुसार, मुर्गी पालन के व्यवसाय को मुख्य रूप से दो श्रेणियों में बांटा जाता है, और दोनों के लिए ही रख-रखाव और जगह की जरूरतें पूरी तरह से अलग-अलग होती हैं।
- बॉयलर मुर्गी पालन: यह श्रेणी मुख्य रूप से मांस (मीट) उत्पादन के उद्देश्य से पाली जाती है। यदि आप बॉयलर मुर्गियों को डीप लिटर सिस्टम यानी फर्श पर बिछावन बिछाकर पालने का तरीका अपनाते हैं, तो इसके लिए प्रति पक्षी लगभग 1 वर्ग फीट जगह की आवश्यकता होती है।
- लेयर मुर्गी पालन: लेयर मुर्गियों को मुख्य रूप से अंडा उत्पादन के उद्देश्य से पाला जाता है। इन्हें रखने के लिए दो अलग-अलग प्रणालियां इस्तेमाल की जाती हैं:
- डीप लिटर सिस्टम: यदि आप लेयर मुर्गियों को इस पारंपरिक फर्श प्रणाली में रखना चाहते हैं, तो प्रति पक्षी लगभग 1.5 से 2 वर्ग फीट जगह की जरूरत पड़ती है।
- केज़ सिस्टम (पिंजरा प्रणाली): यदि आप आधुनिक केज सिस्टम का उपयोग करते हैं, तो इसमें जगह की बचत होती है। इस प्रणाली के तहत प्रति पक्षी लगभग 0.5 से 0.8 वर्ग फीट जगह ही पर्याप्त मानी जाती है।
वैज्ञानिक तरीके से करें पोल्ट्री फार्म का निर्माण
पशु विशेषज्ञ ने बताया कि मुर्गी पालन में सफलता पाने के लिए फार्म का वैज्ञानिक तरीके से बना होना सबसे बुनियादी और जरूरी शर्त है। फार्म का निर्माण करते समय निम्नलिखित मापों और पैमानों का पूरा ध्यान रखना चाहिए:
सबसे पहले, पोल्ट्री फार्म को मुख्य जमीन की सतह से लगभग 1.5 से 2 फीट की ऊंचाई पर बनाया जाना चाहिए। इस ऊंचाई के कारण फार्म के भीतर नमी को नियंत्रित रखने में आसानी होती है, जिससे मुर्गियों में फंगस और बैक्टीरिया का खतरा टलता है। साथ ही, इससे फार्म की साफ-सफाई करने में भी काफी सुविधा होती है।
इसके अलावा, फार्म की दीवारों और छत की ऊंचाई का अनुपात भी वैज्ञानिक होना चाहिए। फार्म की साइड वॉल (किनारे की दीवारों) की ऊंचाई करीब 6 से 7 फीट होनी चाहिए, जबकि बीच की छत (सेंटर) की ऊंचाई लगभग 10 से 12 फीट होनी चाहिए। यह ढांचा फार्म के भीतर ताजी हवा के आवागमन यानी वेंटिलेशन को बेहतर बनाने के लिए बहुत जरूरी है, जिससे मुर्गियां स्वस्थ रहती हैं और उन्हें घुटन महसूस नहीं होती।
हवा के बेहतर प्रवाह को बनाए रखने के लिए पोल्ट्री फार्म की चौड़ाई को भी सीमित रखना आवश्यक है। एक आदर्श फार्म की चौड़ाई लगभग 22 से 25 फीट के बीच होनी चाहिए। चौड़ाई इससे अधिक होने पर हवा आर-पार नहीं जा पाती, जिससे मुर्गियों के बीमार होने का खतरा बढ़ जाता है।
बीमारियों से बचाव और सुरक्षा के कड़े नियम
यदि कोई किसान एक से अधिक पोल्ट्री फार्म का निर्माण कर रहा है, तो दो फार्मों के बीच की दूरी का विशेष ध्यान रखना आवश्यक है। वैज्ञानिक मानकों के अनुसार, एक फार्म से दूसरे फार्म के बीच कम से कम 50 से 100 फीट की दूरी जरूर होनी चाहिए।
इस दूरी को बनाए रखने का सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि यदि किसी आपात स्थिति या वायरस के संक्रमण के कारण किसी एक फार्म में बीमारी फैलती है, तो वह आसानी से दूसरे फार्म की मुर्गियों तक नहीं पहुंच पाती। इस तकनीक को अपनाकर आपदा या बीमारी की स्थिति में होने वाले भारी आर्थिक नुकसान को बहुत कम किया जा सकता है। जगह, निर्माण शैली और इन वैज्ञानिक पैमानों का सावधानीपूर्वक पालन करके कोई भी व्यक्ति मुर्गी पालन के व्यवसाय को सुरक्षित, स्थिर और अत्यधिक मुनाफेदार बना सकता है।
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