सिरोही का अनोखा मंदिर: जहां 84 फीट ऊंचे स्वयंभू शिवलिंग के साथ है पाप-पुण्य की परख

राजस्थान के सिरोही जिले में स्थित मंदार की पहाड़ियों पर एक प्राचीन मंदिर है, जहां का गंगा कुंड और पाप-पुण्य गली श्रद्धालुओं के बीच गहरी आस्था का केंद्र बने हुए हैं।

सिरोही की पहाड़ियों पर विराजे लीलाधारी महादेव

राजस्थान के सिरोही जिले में गुजरात की सीमा के करीब बसा मंदार कस्बा अपनी धार्मिक और ऐतिहासिक धरोहरों के लिए जाना जाता है। यहां की एक पहाड़ी पर लीलाधारी महादेव का बेहद पवित्र मंदिर स्थित है। इस मंदिर की सबसे बड़ी खासियत यहां का स्वयंभू शिवलिंग है, जो किसी इंसान द्वारा निर्मित नहीं है बल्कि पहाड़ी का ही हिस्सा है। यह शिवलिंग करीब 84 फीट ऊंचा है, जिसकी पूजा के लिए दूर-दूर से भक्त यहां पहुंचते हैं। मंदिर के वातावरण में एक विशेष प्रकार की शांति और दैवीय आभा महसूस की जा सकती है।

गमानिया कुंड और जल संरक्षण की परंपरा

इस मंदिर परिसर के भीतर कई महत्वपूर्ण स्थल मौजूद हैं, जिनमें गमानिया कुंड का विशेष महत्व है। पिछले कुछ समय से यह कुंड झाड़ियों के कारण उपेक्षित हो गया था, जिससे इसका जल संरक्षण वाला स्वरूप प्रभावित हो गया था। हालांकि, स्थानीय भक्तों ने मिलकर श्रमदान की अनूठी मिसाल पेश की और इस कुंड की गहन सफाई की। इस कुंड की आकृति एक जहाज जैसी है और भक्त इसे अत्यंत पवित्र मानते हैं। स्थानीय जनश्रुतियों के अनुसार, गमानिया कुंड का जल औषधीय गुणों से युक्त है और इसके स्पर्श से भक्तों की कई तरह की परेशानियां दूर हो जाती हैं। वहीं, परिसर में मौजूद गंगा कुंड का जल कभी सूखता नहीं है, यह पूरे वर्ष पानी से भरा रहता है। मंदिर की ऊंचाई तक पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को करीब 286 सीढ़ियां पार करनी पड़ती हैं।

पौराणिक कथा और रावण से जुड़ा इतिहास

स्थानीय भक्त सोमाराम के अनुसार, यह मंदिर अत्यंत प्राचीन है। मान्यता है कि जब लंकापति रावण मंदा शिखर को उठाकर लंका ले जाने का प्रयास कर रहा था, तब रास्ते में भगवान विष्णु ने एक ग्वाले का रूप धारण किया। भगवान विष्णु ने अपनी चतुराई से रावण को शिवलिंग नीचे रखने के लिए विवश कर दिया। जैसे ही रावण ने उस शिवलिंग को वहां रखा, वह जमीन में स्थिर हो गया और भगवान शिव स्वयंभू रूप में वहां विराजमान हो गए। इसी मंदा शिखर के कारण इस स्थान का नाम धीरे-धीरे मंदार पड़ गया।

पाप-पुण्य गली का रहस्य

मंदिर परिसर में एक अत्यंत रोचक स्थान है जिसे पाप-पुण्य गली कहा जाता है। दो विशाल चट्टानों के बीच बनी यह एक बहुत ही संकरी जगह है। इसे लेकर प्रचलित मान्यता आज भी लोगों को अचंभित कर देती है। कहा जाता है कि यदि कोई व्यक्ति पाप के भाव लेकर इस गली से गुजरने का प्रयास करता है, तो वह बीच में ही फंस जाता है। इसके विपरीत, पुण्यात्मा या निष्पाप व्यक्ति बिना किसी बाधा के इसे आसानी से पार कर लेते हैं। यही कारण है कि श्रद्धालु इस स्थान पर आकर अपनी आत्म-शुद्धि का परीक्षण भी करते हैं।

श्रद्धालुओं की अटूट आस्था

मंदिर के मुख्य गर्भगृह में स्वयंभू शिवलिंग के अलावा माता पार्वती, भगवान गणेश और मां गंगा की प्रतिमाएं भी स्थापित हैं। संतान प्राप्ति की कामना लिए निसंतान दंपत्ति भी बड़ी संख्या में यहां आते हैं और मनोकामना पूरी होने पर वे मंदिर में घंटी अर्पित करते हैं। इस मंदिर की ख्याति केवल राजस्थान तक ही सीमित नहीं है, बल्कि गुजरात और महाराष्ट्र से भी बड़ी संख्या में भक्त यहां दर्शन के लिए आते हैं। धार्मिक और प्राकृतिक सुंदरता का यह संगम भक्तों के लिए आकर्षण का मुख्य केंद्र है।

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