खेती में खरपतवार नाशक का उपयोग करते समय इन जरूरी बातों का रखें ध्यान, वरना फसल को होगा नुकसान

कृषि विशेषज्ञों ने फसलों की सुरक्षा के लिए खरपतवार नाशक दवाओं के सही इस्तेमाल के बारे में महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं। सही मात्रा और सही समय पर छिड़काव से ही फसल को नुकसान से बचाया जा सकता है।

खरपतवार नाशक का सही उपयोग क्यों जरूरी है

मानसून की शुरुआत के साथ ही खरगोन जिले के खेतों में खरीफ फसलों की रौनक बढ़ गई है। किसान इस समय कपास, सोयाबीन, मक्का, मिर्च और अरहर जैसी फसलों की देखरेख में जुटे हुए हैं। वर्तमान में बुआई का काम पूरा हो चुका है और खेत में फसल के छोटे पौधे अंकुरित होकर बाहर आ गए हैं। हालांकि, इन मुख्य फसलों के साथ खेतों में अनावश्यक खरपतवार या चारा भी तेजी से पनप रहा है। कई किसानों के सामने समस्या यह है कि मुख्य फसल की तुलना में खरपतवार ज्यादा दिखाई देने लगा है। इस समस्या से निपटने के लिए किसान अक्सर चारा मार दवाओं का छिड़काव करते हैं, लेकिन जानकारी के अभाव में वे कुछ ऐसी गलतियां कर बैठते हैं जो उनकी फसल के लिए ही घातक सिद्ध होती हैं। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, खरपतवार नाशक दवा का असर तभी प्रभावी होता है जब उसे सही समय, सही मात्रा और सही तकनीकी तरीके से उपयोग में लाया जाए।

पानी की मात्रा और दवा का गलत अनुपात

खरगोन के कृषि वैज्ञानिक डॉ. राजीव सिंह का कहना है कि खरपतवार नाशक दवाओं के उपयोग में सबसे बड़ी चूक पानी की मात्रा को लेकर होती है। अक्सर किसान यह मान लेते हैं कि कम पानी में दवा का घोल बनाने से वह अधिक शक्तिशाली होगा और खरपतवार जल्दी मर जाएंगे। यह धारणा पूरी तरह गलत है। कई किसान प्रति एकड़ 500 एमएल दवा को केवल 80 से 100 लीटर पानी में घोलकर छिड़क देते हैं। ऐसा करने से दवा का घोल जरूरत से ज्यादा गाढ़ा और तेज हो जाता है, जिसका प्रतिकूल प्रभाव मुख्य फसल पर पड़ता है। यह दवा चारे के साथ फसल के पौधों को भी नुकसान पहुंचाती है और उनकी बढ़त रुक जाती है। वैज्ञानिक स्पष्ट करते हैं कि 500 एमएल दवा के लिए कम से कम 200 लीटर पानी का उपयोग प्रति एकड़ करना अनिवार्य है ताकि घोल का संतुलन बना रहे।

कम पानी का असर और फसल पर दुष्प्रभाव

विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि चाहे फसल के पौधे कितने भी छोटे क्यों न हों, पानी की मात्रा में कटौती नहीं की जानी चाहिए। कुछ किसान सोचते हैं कि खेत में पौधे कम होने पर कम घोल की आवश्यकता होगी, लेकिन यह विचार फसल को भारी नुकसान पहुंचा सकता है। दवा की अधिकता और पानी की कमी होने पर मुख्य फसल के झुलसने का खतरा पैदा हो जाता है। ऐसी स्थिति में पौधों की पत्तियां पीली पड़ सकती हैं और उनकी विकास प्रक्रिया पूरी तरह अवरुद्ध हो सकती है। दवा का प्रभावी परिणाम संतुलित घोल पर ही निर्भर करता है, इसलिए हमेशा तय मानक के अनुसार ही पानी और दवा का अनुपात बनाए रखना चाहिए।

छिड़काव का सटीक समय और तरीका

खरपतवार नाशक दवाओं के छिड़काव के लिए फसल की अवस्था का ध्यान रखना बेहद आवश्यक है। उदाहरण के लिए, कपास की फसल में बुआई के 20 से 25 दिन बाद ही दवा का प्रयोग करना चाहिए। सबसे उपयुक्त समय तब होता है जब खरपतवार केवल 2 से 4 पत्ती की अवस्था में हो। यदि दवा का प्रयोग बहुत जल्दी या बहुत देर से किया जाता है, तो इसके परिणाम अच्छे नहीं मिलते हैं। इसके अलावा, छिड़काव करते समय नोजल की दिशा और स्प्रे करने की ऊंचाई पर ध्यान देना चाहिए ताकि दवा सीधे खरपतवार पर गिरे और फसल पर उसका असर कम से कम हो।

छिड़काव के दौरान बरतने वाली अन्य सावधानियां

  • खेत में पर्याप्त नमी होना आवश्यक है, क्योंकि सूखी जमीन पर दवा का असर बहुत कमजोर हो जाता है।
  • दवा का छिड़काव करने के लिए सुबह या शाम का समय सबसे बेहतर माना गया है।
  • छिड़काव के बाद कम से कम 6 घंटे तक बारिश नहीं होनी चाहिए। यदि दवा डालने के तुरंत बाद बारिश हो जाती है, तो पूरी दवा बह जाएगी और किसान की मेहनत व खर्च दोनों व्यर्थ चले जाएंगे।

इन सभी सुझावों का पालन करके किसान अपनी फसलों को खरपतवार से सुरक्षित रख सकते हैं और बिना किसी अतिरिक्त नुकसान के बेहतर उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं। खेती में सावधानी ही सबसे बड़ा निवेश है।

https://hindi.news18.com/news/agriculture/tips-while-applying-fodder-killing-pesticides-in-the-fields-local18-10622970.html