1857 की क्रांति के महानायक सार्दुलसिंह देवड़ा, जिन्हें आज लोकदेवता के रूप में पूजते हैं लोग

सिरोही जिले के रोवाड़ा गांव के रहने वाले सार्दुलसिंह देवड़ा ने 1857 की क्रांति में अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए थे। आज उन्हें जुजार बावसी के रूप में सिरोही, जालोर और पाली के इलाकों में श्रद्धा के साथ पूजा जाता है।

वीरता और राष्ट्रभक्ति के प्रतीक सार्दुलसिंह देवड़ा

राजस्थान के सिरोही जिले की मिट्टी ने कई ऐसे शूरवीरों को जन्म दिया है जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। इन्हीं में से एक गौरवशाली नाम है रोवाड़ा गांव के सार्दुलसिंह देवड़ा। सार्दुलसिंह देवड़ा को आज केवल एक ऐतिहासिक शख्सियत के तौर पर नहीं, बल्कि सिरोही, जालोर और पाली जैसे जिलों में एक लोकदेवता के रूप में पूजा जाता है। स्थानीय निवासियों और सिरोही के बुजुर्गों के अनुसार, 1857 की क्रांति में सार्दुलसिंह ने जो भूमिका निभाई थी, वह आज भी क्षेत्र के लोगों के लिए प्रेरणा और आस्था का मुख्य केंद्र है। हाल ही में सिरोही के मंडवारिया गांव में उनके सम्मान में एक भव्य मंदिर का निर्माण भी किया गया है। इसके अतिरिक्त, कई अन्य गांवों में भी उनके स्थान बने हुए हैं, जहां भक्त पूरी श्रद्धा के साथ उनकी पूजा-अर्चना करते हैं।

1857 की क्रांति में अंग्रेजी हुकूमत के लिए बने काल

सार्दुलसिंह देवड़ा का जीवन शौर्य और राष्ट्रप्रेम का अद्भुत उदाहरण है। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान जब पूरा देश अंग्रेजी दमन के खिलाफ खड़ा था, तब पश्चिमी राजस्थान में सार्दुलसिंह ने एक योद्धा की भूमिका निभाई। जिस प्रकार मारवाड़ के आउवा में ठाकुर खुशाल सिंह ने ब्रिटिश शासन की नींव हिला दी थी, उसी तरह सिरोही रियासत और आसपास के क्षेत्रों में सार्दुलसिंह का नाम सुनकर अंग्रेजों के पसीने छूट जाते थे। उन्होंने ताउम्र विदेशी सत्ता के आगे घुटने नहीं टेके और निरंतर उनके विरुद्ध संघर्ष जारी रखा।

टॉडगढ़ किले पर धावा और क्रांतिकारियों की रिहाई

सार्दुलसिंह के साहसिक कारनामों की सूची लंबी है। उन्होंने अजमेर के टॉडगढ़ किले पर एक जोरदार हमला बोला था। इस हमले का मुख्य उद्देश्य वहां कैद क्रांतिकारियों को मुक्त करवाना था। इस सफलता के बाद सार्दुलसिंह ने अपना रुख नसीराबाद छावनी की ओर किया और वहां भी अंग्रेजी सत्ता को कड़ी चुनौती दी। उनके नेतृत्व और प्रभावशाली व्यक्तित्व से प्रभावित होकर एरिनपुरा छावनी के सैनिकों ने भी ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ बगावत का बिगुल फूंक दिया था। यह अंग्रेजी शासन के लिए एक बहुत बड़ी और शर्मनाक स्थिति थी, क्योंकि उनका नियंत्रण धीरे-धीरे कम होता जा रहा था।

कैप्टन कोनोली को बनाया था बंधक

अंग्रेजी हुकूमत की साख को उस समय गहरा धक्का लगा जब सार्दुलसिंह ने माउंट आबू के तत्कालीन कमांडिंग ऑफिसर कैप्टन कोनोली को शिवगंज स्थित एक बंगले में घेरकर बंधक बना लिया। इस घटना के बाद अंग्रेज सरकार पूरी तरह से बौखला गई और किसी भी कीमत पर सार्दुलसिंह को पकड़ने की योजना बनाने लगी। हालांकि, आमने-सामने के युद्ध में सार्दुलसिंह को हरा पाना अंग्रेजों के लिए नामुमकिन सा हो गया था, इसलिए उन्होंने कायरतापूर्ण रास्ते का चुनाव किया।

धोखे से हुई शहादत और लोकदेवता के रूप में मान्यता

अंग्रेजों ने सीधे युद्ध में विफल होने के बाद सार्दुलसिंह को धोखे से बंदी बनाने की साजिश रची। 1882 के आसपास अंग्रेजों ने बड़ी चालाकी से उन्हें अपने जाल में फंसा लिया और बंदी बना लिया। इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि अंग्रेजों ने उनके साथ अत्यंत क्रूरता बरती और अंत में गोलियों से छलनी कर उनकी हत्या कर दी। उनकी शहादत के बाद अंग्रेजी शासन ने रोवाड़ा गांव पर अपना कब्जा जमा लिया। सार्दुलसिंह का यह बलिदान क्षेत्र की जनता के लिए कभी न भूलने वाली घटना बन गया। उनकी वीरता से प्रभावित होकर लोग उन्हें झुंझार के रूप में पूजने लगे और आज वे एक लोकदेवता के रूप में सिरोही, जालोर और पाली के अनेकों गांवों में पूजे जाते हैं। उनकी कहानी आज भी आने वाली पीढ़ियों को त्याग और साहस का पाठ पढ़ाती है।

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