विकास के दावों के बीच प्यासा मंडला
देश आजादी के सात दशक से भी अधिक समय पार कर चुका है और आज हम 21वीं सदी के आधुनिक भारत की चर्चा करते हैं। सरकार की ओर से डिजिटल इंडिया और हर घर तक सुविधाएं पहुंचाने के बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं। इन दावों के बीच मध्य प्रदेश के मंडला जिले से एक ऐसी भयावह तस्वीर सामने आई है, जो सरकारी तंत्र की विफलता को उजागर करती है। यहां एक आदिवासी गांव के निवासी अपनी प्यास बुझाने के लिए उस पानी का उपयोग कर रहे हैं, जिसे जानवर भी छूना पसंद न करें।
सरकारी विज्ञापनों और जमीनी हकीकत का अंतर
सरकार केंद्र की हर घर जल योजना और नल-जल योजना के प्रचार-प्रसार पर करोड़ों रुपये खर्च करती है। इन विज्ञापनों में दावा किया जाता है कि हर घर में शुद्ध पेयजल पहुंच रहा है, लेकिन मंडला जिले की खुक्सर पंचायत के खुर्री टोला की हकीकत इन दावों से कोसों दूर है। यहां के आदिवासी परिवारों को ऐसे पानी पर निर्भर रहना पड़ रहा है जो बदबूदार है और कीचड़ से भरा हुआ है। यह स्थिति इतनी दयनीय है कि सामान्य तौर पर जानवर भी ऐसा पानी नहीं पीना चाहते, लेकिन यहां के लोग इसे पीने के लिए अभिशप्त हैं।
खाली नल और झूठे वादे
यह मामला मुख्य रूप से ग्राम पंचायत खुक्सर के आश्रित ग्राम मूड़ाडीह का है। यहाँ के वार्ड क्रमांक 15, जिसे खुर्री टोला के नाम से जाना जाता है, का दृश्य किसी का भी दिल दहला सकता है। प्रशासन की ओर से गांव में पाइपलाइन बिछाने का काम किया गया और घरों तक नल कनेक्शन भी पहुंचाए गए। हालांकि, ये नल सिर्फ दिखावे के लिए लगाए गए थे क्योंकि इनमें आज तक पानी की एक बूंद भी नहीं आई। वर्षों बीत जाने के बाद भी नल सूखे पड़े हैं और लोग सरकारी मदद की प्रतीक्षा में हैं।
ग्रामीणों का संघर्ष और चंदा जुटाने की मजबूरी
जब प्यास असहनीय हो गई और प्रशासन की ओर से कोई पहल नहीं हुई, तो ग्रामीणों ने खुद ही अपनी समस्या का समाधान ढूंढने का प्रयास किया। गांव के गरीब लोगों ने आपस में आर्थिक सहयोग के लिए चंदा इकट्ठा किया। इस जमा राशि से उन्होंने जेसीबी मशीन का इंतजाम किया और जमीन में एक गहरा गड्ढा खोदा। आज यह गड्ढा ही इस गांव के सैकड़ों निवासियों की एकमात्र लाइफलाइन बन चुका है। इसी कीचड़युक्त पानी को छानकर ग्रामीण अपनी और अपने परिवार की प्यास बुझा रहे हैं।
बीमारियों का खतरा
बरसात के मौसम में यह गड्ढा बीमारियों का घर बन गया है। चारों तरफ फैली गंदगी और कीचड़ के कारण यह जलस्रोत संक्रमण का केंद्र बन गया है। गांव की महिलाओं के लिए स्थिति सबसे ज्यादा कठिन है, जिन्हें न केवल अपने लिए बल्कि बच्चों के लिए भी यही दूषित पानी लाना पड़ता है। वे इसे उबालकर पीने की जद्दोजहद करती हैं, लेकिन इसके बावजूद डायरिया, टाइफाइड और पीलिया जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा उन पर हर पल बना रहता है।
प्रशासन की चुप्पी और खोखले आश्वासन
ग्रामीणों ने अपनी इस पीड़ा को लेकर पंचायत कार्यालय से लेकर कलेक्टर कार्यालय तक गुहार लगाई है, लेकिन हर बार उन्हें केवल कोरे आश्वासन देकर वापस भेज दिया गया। स्थानीय प्रशासन ने अब तक इस गंभीर समस्या पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया है। जब इस मुद्दे को लेकर पीएचई विभाग के ईई मनोज भास्कर से संपर्क किया गया, तो उनका जवाब भी रटा-रटाया ही था। उन्होंने हमेशा की तरह दावा किया कि जल्द ही इस समस्या का समाधान किया जाएगा।
भविष्य के लिए चेतावनी
सवाल यह खड़ा होता है कि करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद भी नल-जल योजना का लाभ अंतिम छोर पर बसे इन आदिवासियों तक क्यों नहीं पहुंच पा रहा है? क्या इन लोगों के जीवन का प्रशासन की नजर में कोई महत्व नहीं है? बुनियादी सुविधाओं में जल सबसे अनिवार्य आवश्यकता है। यदि मंडला का प्रशासन समय रहते नहीं जागता है, तो यह गहराता हुआ जलसंकट भविष्य में किसी बड़ी त्रासदी का रूप ले सकता है।
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