केतन हत्याकांड में अब गेट एनालिसिस से होगी चेतन की पहचान, क्या है ओसामा बिन लादेन को पकड़ने वाली यह तकनीक

पुणे के केतन हत्याकांड में पुलिस ने आरोपी चेतन चौधरी के खिलाफ गेट एनालिसिस तकनीक का सहारा लेने का फैसला किया है, जो किसी व्यक्ति की चलने की विशिष्ट शैली का वैज्ञानिक अध्ययन है।

केतन हत्याकांड की जांच में नया मोड़

पुणे में हुए चर्चित केतन हत्याकांड की जांच अब एक बेहद रोचक और वैज्ञानिक मोड़ पर पहुंच गई है। पुलिस इस मामले में मुख्य आरोपी चेतन चौधरी की संलिप्तता साबित करने के लिए गेट एनालिसिस तकनीक का उपयोग करने जा रही है। यह तकनीक न केवल आधुनिक फोरेंसिक विज्ञान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, बल्कि इसका इतिहास काफी गौरवशाली रहा है। कहा जाता है कि इसी तकनीक की मदद से अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए ने ओसामा बिन लादेन की पहचान करने और उसे खोजने में सफलता हासिल की थी। अब सवाल यह है कि आखिर यह गेट एनालिसिस क्या है, यह कैसे काम करता है और क्या यह अदालत में किसी को दोषी ठहराने के लिए पर्याप्त सबूत माना जा सकता है।

क्या है गेट एनालिसिस और कैसे करता है काम

सरल शब्दों में समझें तो गेट एनालिसिस का अर्थ है किसी व्यक्ति के चलने के तरीके या चाल का वैज्ञानिक अध्ययन। जिस तरह हर इंसान की लिखावट, आंखों की पुतली या उंगलियों के निशान अलग-अलग होते हैं, ठीक वैसे ही हर इंसान की चाल भी यूनिक होती है। इसमें एक्सपर्ट्स यह देखते हैं कि कोई व्यक्ति कैसे कदम रखता है, उसके कदमों की लंबाई क्या है, दोनों पैरों के बीच का फासला कितना है, शरीर का संतुलन कैसा है और चलते समय हाथों का मूवमेंट किस तरह का है।

इस प्रक्रिया के दौरान सबसे पहले घटना स्थल के सीसीटीवी फुटेज को बारीकी से खंगाला जाता है। इसके बाद संदिग्ध व्यक्ति को एक सामान्य वातावरण में चलने के लिए कहा जाता है और उसका उच्च गुणवत्ता वाला वीडियो बनाया जाता है। फोरेंसिक एक्सपर्ट्स दोनों वीडियो को कंप्यूटर सॉफ्टवेयर की मदद से फ्रेम दर फ्रेम मिलाकर देखते हैं। इसमें शरीर के झुकाव, गर्दन और कंधों की स्थिति, और चलने की गति जैसे दर्जनों पैरामीटर्स की तुलना की जाती है।

क्यों है यह तकनीक इतनी भरोसेमंद

विशेषज्ञों का मानना है कि इंसान की चाल कई शारीरिक और मानसिक कारकों से मिलकर बनती है। इसमें हड्डियों की संरचना, मांसपेशियों की शक्ति, शरीर का वजन, लंबाई, आयु, किसी पुरानी चोट या फ्रैक्चर का प्रभाव, और यहां तक कि व्यक्ति का मस्तिष्क जिस तरह शरीर को नियंत्रित करता है, उन सबका योगदान होता है। यही कारण है कि अगर कोई अपराधी अपना चेहरा मास्क, हेलमेट या हुडी से ढक भी ले, तो भी अपनी प्राकृतिक चाल को लंबे समय तक बदल पाना उसके लिए बेहद चुनौतीपूर्ण होता है। यदि कोई जानबूझकर अपनी चाल में बदलाव करने की कोशिश करता है, तो उसके शरीर के अन्य अंगों के मूवमेंट में असंतुलन पैदा हो जाता है, जिसे प्रशिक्षित फोरेंसिक विशेषज्ञ आसानी से पकड़ लेते हैं।

कानूनी मान्यता और अदालत का रुख

यह समझना महत्वपूर्ण है कि भारत सहित दुनिया के कई देशों में गेट एनालिसिस को केवल एक सपोर्टिव फोरेंसिक एविडेंस माना जाता है। अदालत में यह एक वैज्ञानिक उपकरण के रूप में जांच को दिशा देने का काम तो करता है, लेकिन इसे अकेले ही किसी व्यक्ति को दोषी करार देने का अंतिम आधार नहीं माना जा सकता। भारतीय न्यायपालिका इस तकनीक पर आधारित रिपोर्ट को अन्य परिस्थितियों और वैज्ञानिक साक्ष्यों के साथ रखकर देखती है। पुलिस आमतौर पर इसे डीएनए रिपोर्ट, फिंगरप्रिंट्स, मोबाइल लोकेशन डेटा और चश्मदीद गवाहों के बयानों के साथ एक कड़ी के रूप में जोड़कर पेश करती है।

तकनीक की सीमाएं और चुनौतियां

फोरेंसिक एक्सपर्ट्स इस बात पर स्पष्ट हैं कि गेट एनालिसिस एक अत्यंत उपयोगी लेकिन विकसित होती हुई तकनीक है। यह 100 प्रतिशत पहचान की गारंटी देने वाला जरिया नहीं है। इसकी विश्वसनीयता पूरी तरह से सीसीटीवी फुटेज की स्पष्टता, रिकॉर्डिंग के एंगल, डेटा की उपलब्धता और विश्लेषण करने वाले विशेषज्ञ की दक्षता पर टिकी होती है। यदि फुटेज धुंधला है या वह सही एंगल से नहीं लिया गया है, तो रिपोर्ट के परिणामों में चूक की संभावना बढ़ जाती है।

जांच में वैज्ञानिक साक्ष्यों की भूमिका

आधुनिक अपराध जांच में अब पारंपरिक पूछताछ के अलावा वैज्ञानिक साक्ष्यों की भूमिका प्रमुख हो गई है। गेट एनालिसिस का मुख्य लाभ तब होता है जब आरोपी ने अपनी पहचान छिपाने के लिए चेहरे को ढका होता है। ऐसी स्थितियों में जहां फेस रिकग्निशन सॉफ्टवेयर फेल हो जाते हैं, वहां इंसान के चलने का अंदाज (वॉकिंग पैटर्न) ही एकमात्र ऐसा ठोस सुराग बचता है, जिसके जरिए जांच एजेंसियां आगे बढ़ सकती हैं। चेतन चौधरी के मामले में भी पुणे पुलिस की यह कोशिश यह साबित करने के लिए है कि सीसीटीवी में दिखाई दे रहा व्यक्ति और आरोपी एक ही हैं।

निष्कर्ष

केतन हत्याकांड में पुलिस का गेट एनालिसिस का फैसला जांच के प्रति गंभीरता को दर्शाता है। हालांकि यह तकनीक कानूनी दायरे में एक सहायक साक्ष्य है, लेकिन इसका वैज्ञानिक आधार काफी मजबूत है। जैसे-जैसे फोरेंसिक विज्ञान आगे बढ़ रहा है, वैसे-वैसे अपराधी के लिए कानून से बचकर निकलना कठिन होता जा रहा है। अब देखने वाली बात यह होगी कि चेतन चौधरी के मामले में यह गेट एनालिसिस रिपोर्ट किस हद तक पुलिस को पुख्ता सबूत दिलाने में मदद करती है और अदालत इस पर क्या रुख अपनाती है।

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