सागर में करोड़ों का सरकारी धन बर्बादी की भेंट
सागर शहर को स्मार्ट बनाने के दावे के साथ पिछले 9 वर्षों से जो मिशन चलाया जा रहा था, वह अब अपने अंतिम पड़ाव पर है। लेकिन अफसोस की बात यह है कि बिना किसी ठोस योजना और दूरदर्शिता के बनाई गई कई इमारतें आज केवल सरकारी खजाने की बर्बादी का जीता जागता सबूत बनकर रह गई हैं। इन प्रोजेक्ट्स पर कुल 60 करोड़ रुपये खर्च किए गए, लेकिन तीन साल पहले उद्घाटन होने के बावजूद इनका कोई उपयोग नहीं हो पाया है। न तो जनता को इनका कोई लाभ मिल रहा है और न ही जिम्मेदार प्रशासनिक अधिकारी इन्हें चालू करने में कोई दिलचस्पी दिखा रहे हैं।
ट्रांसपोर्ट नगर बना बच्चों का खेल का मैदान
स्मार्ट सिटी योजना के अंतर्गत शहर को भारी वाहनों के दबाव से निजात दिलाने के लिए अमावनी में 28 एकड़ भूमि पर एक भव्य ट्रांसपोर्ट नगर का निर्माण किया गया था। इस प्रोजेक्ट पर 20 करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि खर्च की गई थी। आलम यह है कि उद्घाटन के तीन साल बाद भी यहां किसी ट्रांसपोर्ट गतिविधि का नामो-निशान नहीं है। आज यह पूरी जगह वीरान पड़ी है, जहाँ रात के अंधेरे में लाइटें तक नहीं जलतीं। दिन के समय यहां केवल बच्चे क्रिकेट खेलते हुए दिखाई देते हैं, जबकि जिस उद्देश्य से इसे बनाया गया था, वह पूरी तरह से विफल साबित हुआ है।
वर्किंग वूमेन हॉस्टल में पक्षियों का बसेरा
महिलाओं के सशक्तिकरण और कामकाजी महिलाओं को सुरक्षित आवास उपलब्ध कराने के उद्देश्य से 2 करोड़ 20 लाख रुपये की लागत से एक वर्किंग वूमेन हॉस्टल बनाया गया था। योजना के अनुसार, यहाँ महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए प्रशिक्षण और अन्य सुविधाएं दी जानी थीं। लेकिन धरातल पर स्थिति यह है कि ढाई साल से यह बिल्डिंग पूरी तरह खाली पड़ी है। देखरेख के अभाव में अब इस इमारत में कबूतरों और मधुमक्खियों ने अपना पक्का डेरा डाल लिया है। अधिकारियों की लापरवाही का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने कामकाजी महिलाओं तक पहुंचने या उन्हें यहां शिफ्ट करने की जहमत तक नहीं उठाई।
इनक्यूबेशन सेंटर और बस स्टैंड की बदहाली
स्मार्ट सिटी के अन्य प्रोजेक्ट्स का भी हाल कुछ ऐसा ही है। लगभग 17 करोड़ की लागत से तैयार किए गए इनक्यूबेशन सेंटर की चार मंजिला इमारत आज केवल एक शोपीस बनकर रह गई है। इस भवन के अंदर मकड़ी के जाल लगे हुए हैं और बीते 2 वर्षों से यहां का काम पूरी तरह ठप है। प्रशासन अब तक इस केंद्र को चलाने के लिए किसी योग्य एजेंसी को ढूंढने का दावा कर रहा है। वहीं, राजघाट रोड पर बनाई गई न्यू बस स्टैंड की इमारत पर 22 करोड़ रुपये खर्च किए गए, लेकिन यह भी अभी तक शुरू नहीं हो सका है। रात के समय यहां अंधेरा छाया रहता है और दिन में सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर रील बनाने के लिए इस सुनसान जगह का उपयोग करते हैं।
प्रशासन का क्या है पक्ष
इन तमाम सवालों और परियोजनाओं की बदहाली को लेकर सागर की कलेक्टर प्रतिभा पाल का कहना है कि प्रशासन इस बात पर विचार कर रहा है कि स्मार्ट सिटी के तहत निर्मित इन सभी बिल्डिंग्स का उपयोग शहर के हित में कैसे किया जाए। उन्होंने आश्वासन दिया है कि जल्द ही इन स्थानों पर गतिविधियां शुरू की जाएंगी। बहरहाल, जनता यह सवाल पूछ रही है कि आखिर इतने करोड़ों रुपये खर्च करने से पहले इतनी बड़ी योजना में खामियां क्यों रह गईं और अब तक इन इमारतों को क्यों चालू नहीं किया जा सका है।
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