मामले की पृष्ठभूमि और निलंबन की कार्रवाई
हिमाचल प्रदेश के कुल्लू स्थित क्षेत्रीय अस्पताल में प्रसूता मंजू शर्मा की मृत्यु के बाद उपजे हालात अभी भी शांत नहीं हुए हैं। अस्पताल परिसर में बीते दो दिनों तक चले भारी हंगामे और प्रदर्शन के बाद अब स्वास्थ्य विभाग ने कड़ी प्रशासनिक कार्रवाई शुरू कर दी है। इस मामले में पहले गायनी विभाग की डॉक्टर अनु को सस्पेंड किया गया था, वहीं अब नर्स रेश्मा के निलंबन के आदेश भी जारी कर दिए गए हैं। इस कार्रवाई के बाद से जिले के चिकित्सा जगत में भारी रोष व्याप्त है और अब डॉक्टर व नर्सिंग स्टाफ ने सुरक्षा की मांग को लेकर मोर्चा खोल दिया है।
डॉक्टरों और नर्सों ने प्रशासन के खिलाफ खोला मोर्चा
बुधवार को क्षेत्रीय अस्पताल के डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ ने अपना कड़ा विरोध दर्ज कराया है। हिमाचल प्रदेश मेडिकल ऑफिसर एसोसिएशन और इंडियन मेडिकल ऑफिसर एसोसिएशन ने सामूहिक रूप से डीसी कुल्लू के माध्यम से मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू, स्वास्थ्य मंत्री धनीराम शांडिल और स्वास्थ्य सचिव सुधा देवी को एक विस्तृत ज्ञापन प्रेषित किया है। इस ज्ञापन के जरिए चिकित्साकर्मियों ने सरकारी अस्पतालों के भीतर काम कर रहे डॉक्टरों, नर्सों और अन्य स्टाफ की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता जाहिर की है। इसके अतिरिक्त, डॉक्टरों के प्रतिनिधिमंडल ने एएसपी कुल्लू संजीव चौहान से मुलाकात कर उन्हें ज्ञापन सौंपा और इस पूरे मामले में दोषियों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई करने की पुरजोर मांग की है।
भीड़ द्वारा हुड़दंग और लगाए गए गंभीर आरोप
इंडियन मेडिकल एजुकेशन जिला कुल्लू के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र कोहली ने घटनाक्रम पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि पिछले दो दिनों में अस्पताल के भीतर जिस तरह का माहौल बनाया गया, वह बेहद चिंताजनक है। उन्होंने बताया कि करीब 2,000 से 2,500 लोगों की भीड़ ने अस्पताल में घुसकर न केवल हुड़दंग मचाया, बल्कि ड्यूटी पर तैनात डॉक्टरों और नर्सों के प्रति अत्यंत अभद्र भाषा का प्रयोग भी किया। डॉ. कोहली ने आरोप लगाया कि भीड़ ने चिकित्साकर्मियों को हत्यारा तक करार दिया और मेडिकल सुपरिंटेंडेंट व सीएमओ पर अनुचित दबाव बनाकर उनसे माफीनामा लिखवाया। इस पूरी घटना के कारण अस्पताल में काम करने वाले सभी कर्मचारियों में डर का माहौल व्याप्त है।
सोशल मीडिया पर जानकारी वायरल करने का आरोप
डॉक्टरों के संगठन ने अपनी शिकायत में प्रमुखता से इस बात का जिक्र किया है कि अस्पताल की आंतरिक विभागीय रिपोर्ट को जबरन सार्वजनिक करवाया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि इस पूरी प्रक्रिया का फेसबुक लाइव किया गया, जिससे डॉक्टरों और नर्सों की व्यक्तिगत जानकारी, नाम और फोटो सोशल मीडिया पर सार्वजनिक हो गए। संगठन का तर्क है कि इससे न केवल स्वास्थ्यकर्मियों की निजता का हनन हुआ है, बल्कि उनके और उनके परिवारों की सुरक्षा के लिए भी गंभीर खतरा उत्पन्न हो गया है। डॉक्टरों ने मांग की है कि ऐसे गैरकानूनी कृत्यों को अंजाम देने वाले व्यक्तियों पर तुरंत केस दर्ज किया जाए।
कार्यभार और सुरक्षा का मुद्दा
क्षेत्रीय अस्पताल की नर्सिंग स्टाफ एसोसिएशन की अध्यक्ष अमिता पॉल ने स्टाफ नर्सों पर लग रहे आरोपों को पूरी तरह बेबुनियाद करार दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि अस्पताल में स्टाफ नर्सों पर काम का बोझ अत्यधिक है। घटना का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि जिस दिन 21 जून को मंजू शर्मा की डिलीवरी हुई थी, उस दिन अस्पताल में कुल 9 गर्भवती महिलाओं की डिलीवरी कराई गई थी। सीमित संसाधनों और अधिक कार्यभार के बावजूद नर्सें अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभा रही हैं। ज्ञापन में यह भी स्पष्ट किया गया कि घटना के समय अस्पताल में 218 मरीज भर्ती थे और 11 मरीज आपातकालीन स्थिति में अपना उपचार करवा रहे थे। हंगामे के कारण इन मरीजों की चिकित्सा व्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई।
बंटी सराजी और अन्य के खिलाफ शिकायत
डॉक्टरों के संगठन ने अपने ज्ञापन में स्पष्ट रूप से बंटी सराजी, संजय चौहान और सुमित ठाकुर सहित अन्य व्यक्तियों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई है। एसोसिएशन का दावा है कि इन लोगों ने ही भीड़ को उकसाया और अस्पताल के प्रशासनिक कार्यालय, पंजीकरण काउंटर, बाल रोग वार्ड और आपातकालीन विभाग तक पहुंचकर अव्यवस्था फैलाई। संगठन का आरोप है कि भीड़ ने डॉक्टरों और नर्सों के साथ धक्का-मुक्की की और उन्हें डराने-धमकाने का प्रयास किया। डॉक्टरों ने प्रशासन से मांग की है कि वे निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करें और स्वास्थ्य संस्थानों को सुरक्षित कार्यस्थल बनाए रखने के लिए ठोस कदम उठाएं ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो सके।
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