भारत के शहरों में तेजी से बढ़ रहा ओजोन प्रदूषण का खतरा, दिल्ली-NCR सबसे ज्यादा प्रभावित

सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट की एक नई रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि ज़मीन के पास मौजूद ओजोन अब भारत के शहरों के लिए एक गंभीर स्वास्थ्य चुनौती बन गई है। यह प्रदूषण केवल गर्मियों तक सीमित न रहकर अब साल भर का संकट बन चुका है और दिल्ली-एनसीआर समेत कई प्रमुख शहरों में इसके स्तर ने चिंता बढ़ा दी है।

ओजोन प्रदूषण का बढ़ता संकट

सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट यानी CSE की ओर से हाल ही में जारी किए गए अध्ययन के आंकड़े बेहद डराने वाले हैं। शोध में सामने आया है कि भारत के विभिन्न शहरों में ज़मीनी स्तर का ओजोन प्रदूषण बहुत तेजी से अपने पैर पसार रहा है। पहले यह माना जाता था कि ओजोन की समस्या केवल गर्मियों के मौसम में या देश के कुछ उत्तरी हिस्सों तक सीमित है, लेकिन ताजा शोध ने इन धारणाओं को पूरी तरह बदल दिया है। अब यह एक ऐसी चुनौती बन गया है जो साल भर बनी रहती है और आम जनता के स्वास्थ्य के साथ-साथ जलवायु पर भी प्रतिकूल प्रभाव डाल रही है। दिल्ली और एनसीआर का इलाका इस खतरे का सबसे बड़ा केंद्र या हॉटस्पॉट बनकर उभरा है, जहां वायु गुणवत्ता का स्तर लंबे समय तक खराब बना रहता है।

ओजोन क्या है और यह क्यों खतरनाक है

ओजोन एक अदृश्य गैस है जो हवा में प्रदूषण के रूप में मौजूद रहती है। यह वायुमंडल की ऊपरी परत में तो सुरक्षा प्रदान करती है, लेकिन ज़मीन के स्तर पर यह बेहद घातक होती है। यह तब उत्पन्न होती है जब गाड़ियों से निकलने वाला धुआं, उद्योगों का उत्सर्जन, घरेलू ईंधन और कचरा जलाने से निकलने वाली नाइट्रोजन ऑक्साइड और वोलाटाइल ऑर्गेनिक कंपाउंड यानी VOCs तेज धूप में आपस में प्रतिक्रिया करते हैं। CSE की 2021 से 2026 के बीच की गई छह साल लंबी स्टडी, जिसमें 25 शहरों का डेटा शामिल है, यह दर्शाती है कि अब यह समस्या तटीय और मैदानी, दोनों तरह के शहरों में समान रूप से फैल चुकी है।

स्वास्थ्य पर पड़ने वाले गंभीर प्रभाव

विशेषज्ञों का कहना है कि ज़मीनी ओजोन मानव शरीर के लिए सबसे खतरनाक प्रदूषकों में से एक है। इसका सीधा असर हमारे श्वसन तंत्र पर पड़ता है। यह फेफड़ों के ऊतकों को नुकसान पहुंचाती है और सांस की नली में सूजन का कारण बनती है। जिन लोगों को अस्थमा या एलर्जी की समस्या है, उनके लिए ओजोन का बढ़ता स्तर और भी जानलेवा साबित हो सकता है। लंबे समय तक ओजोन के संपर्क में रहने से हार्ट अटैक, स्ट्रोक और COPD जैसी दिल और फेफड़ों की गंभीर बीमारियों का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। इसके अलावा, यह धूल और पराग जैसे एलर्जी पैदा करने वाले तत्वों के प्रति शरीर की संवेदनशीलता को बढ़ा देती है, जिससे सांस लेने में तकलीफ होना और इमरजेंसी में अस्पताल जाना एक आम स्थिति हो गई है।

दिल्ली-एनसीआर: ओजोन का सबसे बड़ा हॉटस्पॉट

अध्ययन के मुताबिक, दिल्ली-एनसीआर ने ओजोन हॉटस्पॉट के रूप में अपनी सबसे खराब स्थिति दर्ज की है। शोध की अवधि के दौरान कुल 71 दिनों में से हर दिन यहां ओजोन का स्तर राष्ट्रीय आठ-घंटे के मानक से अधिक पाया गया। दिल्ली के करीब 9 अलग-अलग मॉनिटरिंग स्टेशनों पर हर दिन नियमों का उल्लंघन देखा गया। इतना ही नहीं, नोएडा, ग्रेटर नोएडा और गाजियाबाद जैसे सटे हुए इलाकों में भी ओजोन की सांद्रता लगातार बढ़ी हुई मिली है। वायु प्रदूषण के इस स्वरूप में बदलाव का मुख्य कारण PM 2.5 और PM 10 जैसे सूक्ष्म कणों की अधिकता और बढ़ते तापमान को माना जा रहा है।

प्रमुख शहरों की स्थिति और आँकड़े

इस साल 1 मार्च से 10 मई के बीच विश्लेषण किए गए 25 में से 15 शहरों में ओजोन का स्तर तय मानकों से कहीं अधिक दर्ज किया गया। आंकड़ों पर नजर डालें तो चंडीगढ़ में ओजोन का औसत स्तर 173 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर तक पहुंच गया, जो कि सबसे अधिक है। इसके बाद जयपुर में 120 माइक्रोग्राम, अहमदाबाद में 115 माइक्रोग्राम और भोपाल में 109 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर का स्तर दर्ज किया गया। केवल उत्तर भारत ही नहीं, बल्कि अब मुंबई, चेन्नई और बेंगलुरु जैसे दक्षिण और पश्चिम भारतीय शहरों में भी ओजोन प्रदूषण का ट्रेंड चिंताजनक स्तर पर पहुंच चुका है। मुंबई में तो यह साल भर बना रहता है, जबकि बेंगलुरु में इसका फैलाव काफी लंबा है।

लंबे समय तक रहने वाला प्रदूषण

स्टडी का एक और हैरान करने वाला पहलू यह है कि ओजोन अब कुछ घंटों के लिए नहीं बल्कि दिन के लंबे समय तक हवा में बनी रहती है। भोपाल में ओजोन का स्तर लगभग 17 घंटों तक सुरक्षित सीमा से ऊपर दर्ज किया गया। इसी तरह लखनऊ में 16 घंटे, जबकि मुंबई और बेंगलुरु में 16 घंटों तक ओजोन का खतरा बना रहा। यह केवल दिन तक ही सीमित नहीं है, बल्कि अब कई शहरों में रात के समय भी ओजोन का स्तर कम नहीं होता। दिल्ली-एनसीआर में स्टडी के दौरान 46 रातें ऐसी रहीं जब ओजोन का स्तर खतरनाक सीमा को पार कर गया। सूरज डूबने के बाद भी ओजोन का बने रहना वायुमंडलीय स्थितियों और प्रदूषण के जमाव को दर्शाता है।

कृषि और जलवायु पर विनाशकारी असर

ओजोन का प्रभाव केवल इंसानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह खेती और पर्यावरण के लिए भी घातक है। यह पौधों में प्रकाश-संश्लेषण की प्रक्रिया को बाधित करती है, जिससे फसलों की पैदावार में भारी गिरावट आती है। शोध के अनुसार, ओजोन के कारण भारत में गेहूं की फसल को हर साल करीब 14 से 15 प्रतिशत तक का नुकसान हो सकता है। इसके अलावा, ओजोन गर्मी को सोखने का काम करती है, जिससे जलवायु परिवर्तन की गति तेज होती है और ग्लोबल वार्मिंग का चक्र और भी खतरनाक हो जाता है। यही नहीं, शहरी इलाकों से निकलने वाला यह प्रदूषण हिमालयी क्षेत्रों तक पहुंचकर वहां के ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने का कारण भी बन सकता है।

समाधान की दिशा में जरूरी कदम

CSE की एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर अनुमिता रॉय चौधरी का मानना है कि अब समय आ गया है कि हम अपनी नीति में बदलाव करें। उन्होंने सलाह दी है कि 'नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम' के तहत केवल पार्टिकुलेट मैटर पर ध्यान देने के बजाय, ओजोन को पैदा करने वाले नाइट्रोजन ऑक्साइड और वोलाटाइल ऑर्गेनिक कंपाउंड के उत्सर्जन को कम करने पर व्यापक ध्यान दिया जाए। परिवहन, उद्योगों और कचरा जलाने जैसी गतिविधियों को नियंत्रित करना अनिवार्य है। इसके साथ ही, प्रदूषण प्रबंधन को केवल शहर के दायरे तक सीमित न रखकर 'एयरशेड' यानी हवा के बहाव वाले पूरे क्षेत्रीय आधार पर लागू किया जाना चाहिए, ताकि राज्य की सीमाओं से परे जाकर इस संकट से निपटा जा सके।

https://www.indiatv.in/india/national/ozone-pollution-spreading-indian-cities-delhi-ncr-worst-hit-causing-harm-to-health-and-crops-2026-07-01-1228448