आम का सीजन और मुरादाबाद की मिठास
इस समय आम का भरपूर सीजन चल रहा है और बाजार अलग-अलग किस्मों और नामों के फलों से भरे पड़े हैं। मुरादाबाद मंडल में उत्पादित होने वाले आमों की बात ही कुछ और है। यहां पैदा होने वाली आम की पांच ऐसी खास किस्में हैं जो अपने अनूठे स्वाद और मनमोहक खुशबू के कारण लोगों की पहली पसंद बनी हुई हैं। इनमें मल्लिका, हरामजादा, बॉम्बे ग्रीन जिसे मालदा भी कहते हैं, रामकेला और गुलाब खास शामिल हैं। ये किस्में न केवल भारत में बल्कि विदेशों में भी अपने खास गुणों के लिए जानी जाती हैं।
मल्लिका आम: निर्यात के लिए है बेहतरीन
मल्लिका आम मुख्य रूप से नीलम और दशहरी का एक संकर रूप है, जिसे भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान यानी IARI पूसा द्वारा विकसित किया गया है। यह आम जून के अंत से लेकर जुलाई तक पककर तैयार होता है। सीजन के आखिरी दिनों में बाजार में आने के कारण किसानों को इसका काफी अच्छा दाम मिल जाता है। इस किस्म का वजन लगभग 300 से 400 ग्राम के बीच होता है। इसका गूदा गहरे नारंगी रंग का होता है और इसमें रेशे बिल्कुल नहीं होते। अत्यधिक मिठास इसकी सबसे बड़ी पहचान है। यह आम 10 से 12 दिनों तक आसानी से खराब नहीं होता, जिसकी वजह से इसे निर्यात करने के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है।
खेती और उत्पादन का तरीका
मल्लिका आम का उत्पादन मुरादाबाद के अलावा उत्तर प्रदेश के अन्य हिस्सों, बिहार, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में भी किया जाता है। मुरादाबाद की दोमट मिट्टी और यहां की गर्म जलवायु इसके विकास के लिए अत्यंत अनुकूल है। इसके कलम वाले पौधों को जुलाई से अगस्त या फरवरी से मार्च के दौरान 10x10 मीटर की दूरी पर लगाया जाता है। शुरुआती 2 सालों तक पौधों को नियमित सिंचाई की बहुत जरूरत होती है। अच्छी पैदावार के लिए साल में दो बार गोबर की खाद और NPK का प्रयोग करना चाहिए। यह पौधा आमतौर पर 4 साल में फल देना शुरू कर देता है और एक परिपक्व पेड़ से 150 किलो तक आम प्राप्त हो सकते हैं।
हरामजादा: एक अनोखा और दुर्लभ नाम
मुरादाबाद मंडल में एक ऐसी दुर्लभ किस्म भी पाई जाती है जिसे हरामजादा नाम से पुकारा जाता है। मुख्य रूप से इसका उत्पादन उत्तर प्रदेश के बागपत के रतौल और लखनऊ के आसपास के क्षेत्रों में होता है, लेकिन मुरादाबाद में भी इसे उगाया जाता है। दिखने में यह आम बहुत ही आकर्षक और चमकदार होता है। देहाती इलाकों में हरामजादा शब्द को अक्सर गाली या गुस्से के तौर पर देखा जाता है, लेकिन यहां मामला बिल्कुल अलग है। जब किसी बाग में किसी बिना नाम की किस्म का पौधा अपने आप बीज से उग आता है और उस पर बेहद स्वादिष्ट फल आने लगते हैं, तो स्थानीय लोग इसे मजाकिया अंदाज में यही नाम दे देते हैं।
बॉम्बे ग्रीन या मालदा आम
बॉम्बे ग्रीन आम, जिसे लोकप्रिय रूप से मालदा आम भी कहा जाता है, उत्तर भारत की सबसे पुरानी और चर्चित किस्मों में शुमार है। मुरादाबाद मंडल के बिजनौर जिले में इसका बड़े पैमाने पर उत्पादन होता है। इस फल का मध्यम आकार होता है और इसका वजन 200 से 250 ग्राम तक रहता है। इसके छिलके पतले और हल्के हरे रंग के होते हैं, जो पकने के बाद भी अपना रंग बहुत ज्यादा नहीं बदलते हैं। इसका गूदा बहुत रसीला होता है और स्वाद में थोड़ा खट्टा-मीठा होता है। यह विशेष रूप से अचार और आम पन्ना बनाने के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है।
रामकेला: अचार उद्योग की पहली पसंद
अचार बनाने के शौकीन लोगों के लिए रामकेला आम सबसे भरोसेमंद किस्म है। इसका सेवन सीधे खाने के बजाय प्रसंस्करण के लिए ज्यादा किया जाता है। यह जून के मध्य से जुलाई तक तैयार हो जाता है। इसका वजन 250 से 350 ग्राम तक हो सकता है। पकने के बाद भी इसका छिलका पीला नहीं पड़ता और यह हरा ही रहता है। इसका गूदा सख्त और रेशेदार होता है, जिसमें सिट्रिक एसिड की मात्रा अधिक होती है। यही कारण है कि रामकेला से बना अचार लंबे समय तक खराब नहीं होता। मुरादाबाद और बरेली बेल्ट में इसका भारी उत्पादन होता है और एक पेड़ से 150 से 200 किलो तक फल मिल जाते हैं।
गुलाब खास: अपनी खुशबू से सबको लुभाता है
अपनी मनमोहक सुगंध के कारण गुलाब खास आम मशहूर है। यह छोटे से मध्यम आकार का आम है जो जून के पहले हफ्ते में ही पक जाता है। एक फल का वजन आमतौर पर 150 से 200 ग्राम होता है। इसका छिलका पीला और गुलाबी रंग का होता है। पकने पर इसमें से गुलाब जैसी तेज खुशबू आती है, जिसके चलते इसे यह नाम मिला है। इसका गूदा नरम, रेशा रहित और काफी मीठा होता है। हालांकि, इसकी शेल्फ लाइफ काफी कम होती है, लेकिन स्वाद के मामले में इसका कोई मुकाबला नहीं है। मुरादाबाद मंडल के अमरोहा क्षेत्र में भी इसका अच्छी संख्या में उत्पादन होता है।
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