भरत तिवारी हत्याकांड: क्या जांच सही दिशा में है? डीआईजी की कार्यशैली और पुलिस की चुप्पी पर उठे बड़े सवाल

भरत तिवारी हत्याकांड में पुलिस की लचर जांच और संदेहास्पद कार्रवाई को लेकर पीड़ित परिवार और स्थानीय लोग न्याय की मांग कर रहे हैं। मामले की जांच कर रहे डीआईजी की भूमिका और आरोपी पुलिसकर्मियों की अब तक न हुई गिरफ्तारी पर कई गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

जांच की प्रक्रिया पर गहराते संदेह

बिहार के चर्चित भरत तिवारी हत्याकांड ने पुलिस की कार्यप्रणाली और उनकी तटस्थता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं। मृतक भरत तिवारी के परिजनों का आरोप है कि पुलिस प्रशासन शुरू से ही इस मामले में उदासीन रवैया अपना रहा है। एफआईआर दर्ज करने में देरी से लेकर अब तक नामजद आरोपियों को गिरफ्तार न करने तक, हर कदम पर पुलिस की नीयत पर शक पैदा हो रहा है। परिजनों का कहना है कि उनकी लिखित शिकायतों को भी शुरुआत में नजरअंदाज किया गया और केवल मीडिया के दबाव के बाद ही कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई। अब जब शाहबाद रेंज के डीआईजी सत्यप्रकाश इस मामले की जांच कर रहे हैं, तो पीड़ित परिवार और स्थानीय निवासियों का गुस्सा और बढ़ गया है। उनकी जांच का तरीका न्याय मिलने की उम्मीदों को धूमिल कर रहा है, क्योंकि जमीन पर काम करने के बजाय फाइलों में उलझी हुई यह प्रक्रिया कई अनसुलझी पहेलियां पीछे छोड़ रही है।

डीआईजी की भूमिका और ग्राउंड जीरो से दूरी

घटनास्थल का निरीक्षण किसी भी बड़ी आपराधिक जांच का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होता है, लेकिन इस मामले में डीआईजी सत्यप्रकाश का रवैया हैरान करने वाला है। आरोपों के अनुसार, डीआईजी ने अब तक केवल एक बार घटनास्थल का दौरा किया है और वह भी तब जब सरकार द्वारा गठित न्यायिक जांच के तहत जस्टिस विनोद वहां पहुंचे थे। उस वीआईपी दौरे के बाद से डीआईजी ने घटनास्थल का रुख नहीं किया है। इसके अलावा, मामले के चश्मदीद गवाहों के बयान दर्ज करने में भी घोर लापरवाही बरती गई है। एक वरिष्ठ अधिकारी का इस तरह से मामले से दूरी बनाए रखना यह संकेत देता है कि जांच का मुख्य उद्देश्य केवल औपचारिकता पूरी करना है, न कि दोषियों को सजा दिलाना।

जांच के दौरान नजरअंदाज किए गए 5 अहम सवाल

कानून के जानकारों और घटनाक्रम पर नजर रखने वालों का मानना है कि डीआईजी को खुद ग्राउंड जीरो पर जाकर जांच करनी चाहिए थी। इस मामले में पांच ऐसे सुलगते सवाल हैं, जिनका जवाब अभी भी नहीं मिल पाया है:

  • दूरी और रेंज का गणित: पुलिस और भरत तिवारी के बीच की वास्तविक दूरी क्या थी? जिस रेंज से पुलिस ने गोली चलाने का दावा किया है, क्या वह बैलिस्टिक मानकों के हिसाब से संभव है या इसे जबरदस्ती गढ़ा गया है?
  • संघर्ष का विवरण: जब तत्कालीन थाना प्रभारी भरत के कंधे पर हाथ रखकर आगे ले जा रहे थे, तो उस समय स्थिति क्या थी? गोली चलने से पहले क्या भरत ने बचाव के लिए संघर्ष किया था? इस पहलू के साक्ष्य अब तक क्यों नहीं जुटाए गए?
  • फिंगरप्रिंट ओवरलैपिंग की चूक: घटना के तुरंत बाद जब एसडीपीओ के अंगरक्षक ने भरत की पिस्तौल उठाई, तो क्या उन्होंने दस्ताने पहने थे? अगर नहीं, तो उनके फिंगरप्रिंट्स सबूतों को खराब कर चुके होंगे। इस लापरवाही के लिए कौन जवाबदेह है?
  • पिस्तौल की स्थिति: भरत द्वारा पिस्तौल फेंके जाने के समय उसमें कितनी गोलियां बची थीं? क्या पिस्तौल पूरी तरह खाली थी या उसमें कारतूस मौजूद थे? यह तथ्य पूरी घटना की दिशा बदल सकता है।
  • FSL रिपोर्ट में देरी: घटना को बीते इतना समय हो चुका है, लेकिन विधि विज्ञान प्रयोगशाला यानी FSL की जांच रिपोर्ट अब तक सार्वजनिक क्यों नहीं हुई है? यह देरी जांच की पारदर्शिता पर सवाल उठाती है।

आरोपी पुलिसकर्मियों की गिरफ्तारी क्यों नहीं?

सबसे बड़ा सवाल यह है कि एफआईआर में नामजद होने के बावजूद एसडीपीओ, तत्कालीन थाना प्रभारी और अन्य पुलिसकर्मियों की गिरफ्तारी अब तक क्यों नहीं हुई है? पुलिस महकमे का अपना तर्क है कि गिरफ्तारी तभी जरूरी होती है जब आरोपी के भागने, सबूत मिटाने या गवाहों को धमकाने का डर हो। हालांकि, इस दलील को मृतक के छोटे भाई चंदन तिवारी ने पूरी तरह से खारिज कर दिया है। चंदन तिवारी का आरोप है कि जिले के एसपी स्वयं पीड़ित परिवार को बयानबाजी न करने की धमकी दे रहे हैं। ऐसे में जब खुद पुलिस प्रमुख का रुख इतना डरावना और पक्षपाती हो, तो आरोपी पुलिसकर्मियों को गवाहों को डराने या साक्ष्य मिटाने के लिए किसी और मेहनत की जरूरत ही क्या है? यह पूरा प्रकरण न्याय व्यवस्था के प्रति आम जनता के भरोसे को कमजोर कर रहा है।

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