सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने चुनी बीजेपी की पिच, क्या योगी आदित्यनाथ की 'मथुरा गुगली' पर होंगे क्लीन बोल्ड?

समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव अयोध्या राम मंदिर में चंदा चोरी के मुद्दे पर भारतीय जनता पार्टी को घेरने की कोशिश कर रहे हैं। इस सियासी दांव के जवाब में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मथुरा और काशी का कार्ड खेलकर अखिलेश के सामने एक नई मुश्किल खड़ी कर दी है।

अयोध्या से शुरू हुआ सियासी घमासान

समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के दौरान चंदा चोरी के आरोपों को उछालकर सीधे भारतीय जनता पार्टी के मजबूत गढ़ यानी उनकी अपनी पिच पर बल्लेबाजी करने की कोशिश की है। अखिलेश का सीधा आरोप है कि भाजपा का लंकाकांड अयोध्या में ही होगा और उनका दावा है कि भगवान के ऑडिट से कोई भी दोषी बच नहीं पाएगा। समाजवादी पार्टी ने इस मुद्दे को पूरी मजबूती से उठाया है, ताकि राम मंदिर के नाम पर भाजपा को मिलने वाले राजनीतिक श्रेय को ध्वस्त किया जा सके। इस मुद्दे को केवल बयानों तक सीमित नहीं रखा गया, बल्कि सबूत के तौर पर सीसीटीवी फुटेज और गिरफ्तारियों का हवाला देकर अखिलेश यादव ने भाजपा की घेराबंदी करने का पूरा प्रयास किया है।

योगी आदित्यनाथ का आक्रामक पलटवार

बीजेपी अपनी परंपरागत पिच यानी धर्म और हिंदुत्व के मुद्दे पर किसी अन्य को हावी होने देने के मूड में बिल्कुल नहीं है। इस चुनौती का सामना करने के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ स्वयं क्रीज पर उतरे हैं। उन्होंने अखिलेश के अयोध्या को धार्मिक नगरी बनाने के बयान पर तंज कसते हुए नब्बे के दशक के घटनाक्रमों की याद दिलाई। योगी ने तीखे तेवर दिखाते हुए कहा कि अयोध्या को राम भक्तों ने स्वयं संवारा है, और अखिलेश यादव का यह दावा बेबुनियाद है। उन्होंने अखिलेश को उनके पुराने कार्यकाल के दौरान राम भक्तों पर हुई गोलीबारी का भी स्मरण कराया। मुख्यमंत्री ने अखिलेश को नसीहत दी कि उन्हें अपने पुराने राजनीतिक पापों का प्रायश्चित करना चाहिए और हिम्मत जुटाकर रामलला के दर्शन करने जाना चाहिए।

मथुरा की गुगली ने बढ़ाई अखिलेश की मुश्किल

योगी आदित्यनाथ ने केवल पुरानी बातों का जवाब नहीं दिया, बल्कि उन्होंने एक ऐसी राजनीतिक गुगली फेंकी है, जिसने अखिलेश यादव के लिए आगे कुआं और पीछे खाई वाली स्थिति पैदा कर दी है। मुख्यमंत्री ने अखिलेश को सीधी चुनौती देते हुए कहा कि अगर वे सच में धार्मिक होने का दावा करते हैं, तो उन्हें मथुरा और श्रीकृष्ण जन्मभूमि के मसले पर खुलकर अपनी राय रखनी चाहिए। योगी ने आरोप लगाया कि अखिलेश यादव मौलवियों और मुल्लाओं के दबाव में काम करते हैं, इसलिए उनमें सनातन धर्म के मुद्दों पर बोलने की हिम्मत नहीं है।

यह स्थिति समाजवादी पार्टी के लिए बेहद पेचीदा है। अखिलेश यादव स्वयं को यदुवंशी बताते हैं और उनकी पीडीए राजनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा मुस्लिम मतदाता हैं। यदि अखिलेश मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि खाली कराने के पक्ष में खड़े होते हैं, तो उनका मुस्लिम वोट बैंक छिटकने का डर है। वहीं, यदि वे इस विषय पर चुप्पी साधते हैं या विरोध जताते हैं, तो भारतीय जनता पार्टी तुरंत इस बात का प्रचार करेगी कि अखिलेश को अपने आराध्य भगवान कृष्ण की चिंता नहीं है। इस तरह सपा पूरी तरह से अपनी ही राजनीतिक बिसात पर उलझती हुई नजर आ रही है।

2027 के विधानसभा चुनाव की रणनीति

इस पूरी सियासी महाभारत के पीछे भारतीय जनता पार्टी की वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए तैयार की गई फुलप्रूफ प्लानिंग दिखाई देती है। पार्टी का पूरा फोकस अब अवध क्षेत्र से हटकर ब्रज यानी मथुरा की ओर केंद्रित होता जा रहा है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का अब तक 38 बार मथुरा-वृंदावन का दौरा करना इस रणनीति का ही एक हिस्सा है। वर्तमान योगी कैबिनेट में भी ब्रज क्षेत्र से आने वाले मंत्रियों की संख्या 12 है, जो यह दर्शाता है कि मथुरा भाजपा के लिए कितना महत्वपूर्ण है। आगामी 12 जुलाई को भाजपा की राज्य कार्यकारिणी की बड़ी बैठक भी मथुरा में आयोजित की जा रही है, जो इस बात का स्पष्ट संकेत है कि पार्टी अगले चुनावी समर की तैयारी अभी से कर चुकी है।

क्या अखिलेश झेल पाएंगे चुनौती?

कुल मिलाकर, अखिलेश यादव ने अयोध्या में चंदा चोरी का मुद्दा उठाकर जो बाउंसर फेंका था, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मथुरा और काशी के ब्रह्मास्त्र से उसकी धार कुंद कर दी है। भाजपा ने अखिलेश को मजबूर कर दिया है कि वे अपने बनाए गए वोट बैंक के मकड़जाल में ही फंसकर रह जाएं। हिंदुत्व और धर्म की जिस पिच पर अखिलेश यादव बाजी पलटने की उम्मीद लेकर उतरे थे, वहां योगी की मथुरा वाली गुगली ने उन्हें बैकफुट पर धकेल दिया है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि अखिलेश यादव इस सियासी चक्रव्यूह से निकलने के लिए कौन सा नया रास्ता अपनाते हैं, या फिर वे इसी जाल में फंसकर क्लीन बोल्ड हो जाएंगे।

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