पाकिस्तान का भारत के मामलों में अनावश्यक हस्तक्षेप
पाकिस्तान में चल रहे आंतरिक संकट और गहरे आर्थिक और सामाजिक क्लेश को नजरअंदाज करते हुए वहां के पूर्व राजनयिक भारत के धार्मिक मामलों में गहरी दिलचस्पी ले रहे हैं। पाकिस्तान के पूर्व उच्चायुक्त अब्दुल बासित ने एक ताजा बयान में भारत को नसीहत देते हुए कहा है कि भारतीय हिंदुओं को उन धार्मिक स्थलों पर अपना दावा नहीं करना चाहिए, जो वर्तमान में मस्जिद के स्वरूप में मौजूद हैं। बासित का यह बयान भारत के आंतरिक मामलों में पाकिस्तान की बढ़ती दखलंदाजी को दर्शाता है, जबकि खुद पाकिस्तान अपने देश में अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करने में पूरी तरह विफल रहा है।
1991 के कानून का हवाला देकर ज्ञान दे रहे बासित
अब्दुल बासित ने अपने बयान में 1991 के प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट (पूजा स्थल कानून) का जिक्र किया है। उनका तर्क है कि 15 अगस्त 1947 को जो धार्मिक स्थल जिस रूप में था, उसे उसी अवस्था में बरकरार रखा जाना चाहिए। उन्होंने भारत में चल रहे विभिन्न कानूनी और सामाजिक विवादों पर टिप्पणी करते हुए कहा कि पुरानी मस्जिदों को मंदिरों में बदलने की किसी भी प्रकार की कोशिश पूरी तरह से गलत है। उन्होंने उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और गुजरात जैसे हिंदू बहुल राज्यों में चल रहे विभिन्न विवादों का उल्लेख किया और विशेष रूप से ज्ञानवापी मस्जिद, संभल मस्जिद तथा गुजरात के भरूच का नाम लिया।
पाकिस्तान का रिकॉर्ड और दोहरा मापदंड
यह विडंबना ही है कि जो पाकिस्तान भारत के आंतरिक मामलों पर सवाल उठा रहा है, उसने खुद अपने देश में धार्मिक स्थलों के साथ क्या व्यवहार किया है, यह जगजाहिर है। आंकड़ों पर नजर डालें तो देश के बंटवारे के वक्त पाकिस्तान के क्षेत्र में कुल 365 से 428 हिंदू मंदिर मौजूद थे। आज के समय में इनकी संख्या घटकर केवल 22 या 24 रह गई है। इसका सीधा अर्थ यह है कि पाकिस्तान में 95 फीसदी से भी अधिक प्राचीन मंदिरों को या तो नष्ट कर दिया गया, या उन्हें मस्जिदों, मदरसों, व्यावसायिक दुकानों या अन्य भवनों में तब्दील कर दिया गया। ऐसे देश के राजनयिक का भारत को धार्मिक सहिष्णुता का पाठ पढ़ाना किसी मजाक से कम नहीं है।
भारत के आंतरिक कानून पर क्यों कर रहे टिप्पणी?
बासित ने जोर देकर कहा कि 1991 का कानून एकदम स्पष्ट है और इसे दरकिनार करना उचित नहीं है। हिंदू पक्ष की ओर से ज्ञानवापी और मथुरा की शाही ईदगाह जैसे स्थलों पर किए जा रहे दावों के बीच बासित का यह हस्तक्षेप यह साबित करता है कि पाकिस्तान को भारत के इतिहास और भविष्य को लेकर विवाद खड़ा करने में रुचि है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि 600 से 700 साल पुरानी संरचनाओं को बदलने का अब कोई औचित्य नहीं है, चाहे वे पहले किसी मंदिर के स्थान पर ही क्यों न बनी हों। भरूच का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि वहां 37 फीसदी मुस्लिम आबादी है और खिलजी काल की एक मस्जिद को लेकर विवाद चल रहा है।
सुप्रीम कोर्ट और भारत की कानूनी प्रक्रिया
भारत में मंदिर-मस्जिद के मसले दशकों से कानूनी और सामाजिक चर्चा के केंद्र में रहे हैं। जहां हिंदू संगठन प्राचीन इतिहास और मंदिरों के विनाश के पुख्ता प्रमाणों का हवाला देकर अपनी आस्था के केंद्रों की पुनर्स्थापना की मांग करते हैं, वहीं मुस्लिम पक्ष 1991 के कानून का सहारा लेकर इन्हें रोकने की कोशिश करता है। देश की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट भी कई मामलों में सुनवाई के दौरान इस कानून का संदर्भ दे चुकी है। अब्दुल बासित का यह बयान ऐसे नाजुक समय में आया है जब देश के कई राज्यों में पुरातत्व सर्वेक्षण और अदालती सुनवाई अपने अहम पड़ाव पर है। पाकिस्तान का यह बयान साफ तौर पर भारत की संप्रभुता और उसके आंतरिक न्यायिक मामलों में एक गैर-जिम्मेदाराना टिप्पणी माना जा रहा है।
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