17 साल की नौकरी पर एक नोटिस में पानी फेरने का मामला, झारखंड हाईकोर्ट ने रंजीत को दिया न्याय

बोकारो में चाय पत्ती और बिस्किट घर ले जाने के आरोप में नौकरी से निकाले गए चतुर्थ वर्गीय कर्मचारी को 3 साल बाद हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है। अदालत ने सरकार के इस फैसले को असंवेदनशील और अन्यायपूर्ण बताते हुए उसे तुरंत बहाल करने का आदेश दिया है।

न्याय की मिसाल बना झारखंड हाईकोर्ट का यह फैसला

किसी भी व्यक्ति के जीवन में नौकरी केवल आय का साधन नहीं होती, बल्कि उसकी आजीविका और सम्मान का आधार होती है। झारखंड से एक ऐसा मामला सामने आया है जो यह बताता है कि कानून की नजर में मानवीय संवेदनाएं कितनी महत्वपूर्ण हैं। झारखंड हाईकोर्ट ने एक बेहद संवेदनशील फैसला सुनाते हुए सरकार के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसके तहत एक कर्मचारी को मामूली गलती के लिए नौकरी से निकाल दिया गया था। यह मामला न केवल पीड़ित को राहत देने वाला है, बल्कि प्रशासन की मनमानी पर एक बड़ा सवाल भी खड़ा करता है।

मामला क्या था और बर्खास्तगी की वजह क्या बनी

यह पूरा मामला बोकारो स्थित जिला ग्रामीण विकास अभिकरण यानी DRDA से जुड़ा है। यहां रंजीत कुमार हिमांशु नाम के एक कर्मी पिछले 17 वर्षों से संविदा पर चपरासी के पद पर अपनी सेवाएं दे रहे थे। उन्होंने 31 दिसंबर 2005 से इस पद पर काम करना शुरू किया था। विवाद तब शुरू हुआ जब उन पर कार्यालय से कुछ सामग्री गायब करने और उसे घर ले जाने का आरोप लगा। 16 मार्च 2022 को उप विकास आयुक्त यानी DDC, बोकारो की तरफ से उन्हें एक कारण बताओ नोटिस जारी किया गया। नोटिस में आरोप तो लगाया गया, लेकिन उसमें यह स्पष्ट नहीं किया गया था कि वास्तव में कौन सी सामग्री गायब हुई है।

प्रशासन की जल्दबाजी और नौकरी से बेदखली

कारण बताओ नोटिस जारी होने के कुछ ही हफ्तों के भीतर प्रशासन ने एक कठोर कदम उठाया। 2 मई 2022 को बिना किसी ठोस और उचित प्रक्रिया के रंजीत की सेवाएं समाप्त कर दी गईं। इतने लंबे समय तक ईमानदारी से काम करने वाले एक कर्मचारी को मामूली आरोपों के चलते अचानक नौकरी से बाहर कर देना उनके और उनके परिवार के लिए एक बड़ा झटका था। जब रंजीत को कोई रास्ता नहीं सूझा, तो उन्होंने न्याय की उम्मीद में झारखंड हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और अपनी पीड़ा साझा की।

अदालत में क्या दलीलें दी गईं

झारखंड हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान रंजीत के वकील कृष्ण प्रजापति ने पूरी सच्चाई अदालत के सामने रखी। उन्होंने बताया कि रंजीत के खिलाफ जो कार्रवाई हुई, वह उनके द्वारा की गई छोटी सी भूल के मुकाबले बहुत ही ज्यादा कठोर थी। वकील ने स्वीकार किया कि रंजीत कार्यालय में बचे हुए कुछ बिस्किट और थोड़ी सी चाय पत्ती अपने घर ले गए थे। इसके बाद जब उन्हें नोटिस मिला, तो उन्होंने उन सामग्रियों को वापस भी लौटा दिया था। इसके बावजूद प्रशासन ने उनकी सेवा ही समाप्त कर दी। यह तथ्य सामने आने के बाद कोर्ट ने इस पूरे मामले को बहुत गंभीरता से लिया।

हाईकोर्ट का ऐतिहासिक और संवेदनशील फैसला

झारखंड हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस एमएस सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए प्रशासन के रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई। अदालत ने रंजीत कुमार हिमांशु की बर्खास्तगी को अवैध घोषित करते हुए उसे रद्द कर दिया। कोर्ट ने बोकारो DRDA को निर्देश दिया है कि रंजीत को 10 जुलाई से पहले सेवा में बहाल किया जाए। इसके अलावा, अदालत ने यह भी आदेश दिया है कि उन्हें 30 जुलाई तक 50% पिछला वेतन भी भुगतान किया जाए।

फैसले से मिला एक बड़ा संदेश

अदालत ने अपने फैसले में टिप्पणी की कि प्रशासन का निर्णय असंवेदनशीलता से भरा था और यह न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है। इस फैसले के जरिए कोर्ट ने स्पष्ट संकेत दिया है कि किसी भी कर्मचारी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करते समय दंड और आरोप के बीच संतुलन होना बहुत जरूरी है। यदि किसी कर्मचारी से कोई छोटी भूल होती है और उससे सरकारी व्यवस्था को कोई गंभीर नुकसान नहीं पहुंचा है, तो उसे नौकरी से निकाल देना यानी रोजी-रोटी छीन लेना कतई न्यायसंगत नहीं है। यह फैसला भविष्य के लिए एक नजीर बन गया है, जो यह याद दिलाता है कि कानून का उद्देश्य सुधार और न्याय होना चाहिए, न कि बिना सोचे-समझे किसी का करियर खत्म करना।

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