ओडिशा: दलित महिला को रसोइया बनाने पर भड़के ग्रामीण, आंगनवाड़ी केंद्र पर जड़ा ताला

ओडिशा के बलांगीर जिले में एक दलित महिला की रसोइया के तौर पर नियुक्ति के बाद ग्रामीणों ने कड़ा विरोध किया है और केंद्र पर ताला लगा दिया है।

जातिगत भेदभाव की शर्मनाक घटना

ओडिशा के बलांगीर जिले से एक बेहद हैरान करने वाला मामला सामने आया है। यहाँ एक दलित महिला को रसोइया के पद पर काम मिलने से नाराज ग्रामीणों ने आंगनवाड़ी केंद्र पर ताला लगा दिया है। ग्रामीणों का तर्क है कि वे अपने बच्चों को किसी दलित महिला के हाथ का बना भोजन नहीं खिलाएंगे। यह घटना जिले के मुरीबहाल ब्लॉक स्थित घुसुरामुंडा आंगनवाड़ी केंद्र की है, जिसने एक बार फिर समाज में व्याप्त जातिगत भेदभाव की कड़वी सच्चाई को उजागर कर दिया है।

चार दिनों से ठप है केंद्र का कामकाज

मिली जानकारी के अनुसार, इस आंगनवाड़ी केंद्र में पुन्या हरिपाल नाम की एक दलित महिला को हाल ही में रसोइया के रूप में नियुक्त किया गया था। जैसे ही पुन्या हरिपाल ने अपनी जिम्मेदारी संभालनी शुरू की, स्थानीय आदिवासी समुदाय के लोगों ने इसका विरोध करना शुरू कर दिया। ग्रामीणों का कहना है कि वे इस नियुक्ति को स्वीकार नहीं करेंगे। इस विरोध प्रदर्शन के कारण पिछले चार दिनों से आंगनवाड़ी केंद्र पर ताला लटका हुआ है, जिसके चलते बच्चों का पोषण आहार और केंद्र का दैनिक कामकाज पूरी तरह से बंद पड़ा है।

प्रशासन की समझाइश बेअसर

इस मामले की गंभीरता को देखते हुए स्थानीय प्रशासन हरकत में आया। CDPO पूर्णिमा बैथारू, मुरीबहाल के तहसीलदार जगदीश करतामी और IIC बुलु मुंडा ने मौके पर पहुंचकर स्थिति को संभालने का प्रयास किया। अधिकारियों ने ग्रामीणों के साथ विधिक और कूटनीतिक स्तर पर बातचीत की और उन्हें यह समझाने की कोशिश की कि जाति के आधार पर किसी को काम से रोकना कानूनन एक गंभीर अपराध है। हालांकि, प्रशासन की तमाम कोशिशें और मान-मनौव्वल के बाद भी ग्रामीण अपनी पुरानी और रूढ़िवादी जिद पर अड़े हुए हैं। अब तक इस विवाद का कोई समाधान नहीं निकल सका है और इलाके में तनाव बना हुआ है।

रसोइया का पक्ष

नियुक्त रसोइया पुन्या हरिपाल ने अपनी व्यथा बताते हुए कहा कि उन्हें करीब 15 दिन पहले इस पद पर नियुक्त किया गया था। लेकिन नियुक्ति के बाद से ही ग्रामीणों ने जातिगत आधार पर आपत्ति दर्ज करानी शुरू कर दी। उन्होंने बताया कि ग्रामीण न केवल विरोध कर रहे हैं, बल्कि अपने बच्चों को आंगनवाड़ी केंद्र भेजने से भी इनकार कर रहे हैं। प्रशासन के अधिकारियों के साथ हुई बैठकों के बावजूद अब तक कोई सकारात्मक नतीजा सामने नहीं आया है, जिससे महिला का भविष्य भी अधर में लटका हुआ है।

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