फरीदाबाद के फतेहपुर बिल्लौच में 50 साल पुराने प्लॉटों की फिर से हुई रजिस्ट्री, क्या है पूरी सच्चाई

हरियाणा के फरीदाबाद जिले के फतेहपुर बिल्लौच गांव में हाल ही में 148 परिवारों को जमीन के जो कागज सौंपे गए, वे दरअसल कोई नए प्लॉट नहीं हैं। असल में ये जमीनें 1977 में इंदिरा आवास योजना के तहत आवंटित की गई थीं, जिन्हें अब दोबारा औपचारिक रूप से सौंपा गया है।

क्या है फरीदाबाद का पूरा मामला

हरियाणा सरकार की मुख्यमंत्री ग्रामीण आवास योजना के तहत फरीदाबाद के फतेहपुर बिल्लौच गांव में एक कार्यक्रम आयोजित किया गया, जिसमें 148 लाभार्थियों को उनके प्लॉट के मालिकाना हक वाले दस्तावेज सौंपे गए। इस अवसर पर केंद्रीय राज्य मंत्री कृष्ण पाल गुर्जर ने मुख्य अतिथि के रूप में शिरकत की और लोगों को कागज बांटे। सरकार और प्रशासन की ओर से इसे एक बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश किया गया, लेकिन जब मामले की जमीनी हकीकत जानी गई, तो पता चला कि यह कोई नई जमीन नहीं है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि ये वही 100-100 गज के प्लॉट हैं, जो पांच दशक पहले यानी वर्ष 1977 में इंदिरा आवास योजना के अंतर्गत दिए गए थे।

ग्रामीणों का क्या कहना है

गांव के बुजुर्गों और स्थानीय लोगों की मानें तो प्लॉट और उनके मालिकाना हक के दस्तावेज उन्हें बहुत पहले ही मिल चुके थे। गांव के निवासी राम चरण खलीपा का कहना है कि उन्हें प्लॉट और रजिस्ट्री 1977 में ही प्राप्त हो गई थी। उन्होंने साल 1984 में ही वहां अपना मकान बना लिया था और तब से उनका परिवार वहां निवास कर रहा है। इसी तरह के विचार अन्य ग्रामीणों ने भी साझा किए। उनका कहना है कि इस बार रजिस्ट्री के वितरण के लिए प्रशासन की ओर से उन्हें कोई विशेष बुलावा तक नहीं मिला था। ग्रामीणों के अनुसार, गांव में आज भी बड़ी संख्या में ऐसे प्लॉट हैं जो खाली पड़े हैं और कुछ लोग अपने प्लॉट को बेचने की प्रक्रिया में भी लगे हैं।

क्यों दोबारा बांटे गए दस्तावेज

सरपंच सरोज सैनी ने इस विषय पर सफाई देते हुए कहा कि ये 148 प्लॉट वास्तव में इंदिरा आवास योजना के तहत पुराने आवंटित प्लॉट ही हैं। समय के बीतने के साथ-साथ कई परिवारों की मूल रजिस्ट्री या तो खो गई थी, या फिर नई पीढ़ी को इस बात की पूरी जानकारी नहीं थी कि उनके पास जमीन का मालिकाना हक है। इन प्रशासनिक दिक्कतों और दस्तावेजों के अभाव को दूर करने के लिए पुराने सरकारी रिकॉर्ड को खंगाला गया और दोबारा नए सिरे से कागजात तैयार किए गए। सरपंच का कहना है कि इसका मुख्य उद्देश्य लोगों को उनकी जमीन का वैध प्रमाण देना है ताकि वे अपने प्लॉट पर घर बनाकर रहने के लिए प्रोत्साहित हो सकें।

कब्जे के विवाद और भविष्य की राह

इस पूरे मामले का एक सकारात्मक पहलू यह है कि अब गांव के निवासियों के मन में कब्जे को लेकर व्याप्त डर कम हो गया है। 80 वर्षीय तोता राम ने बताया कि उन्हें 1977 में जो कागज मिले थे, उनकी स्थिति अब काफी बदल चुकी है। कुछ प्लॉटों पर पानी जमा हो जाने के कारण वहां तालाब जैसी स्थिति बन गई थी, लेकिन अब दोबारा दस्तावेज मिलने से लोगों में विश्वास जगा है। ग्रामीणों का मानना है कि अब उनके पास कानूनी सबूत मौजूद हैं, जिससे वे अपने प्लॉट पर निर्माण कार्य बिना किसी बाधा के कर सकेंगे। पहले कुछ लोग जमीन के मालिकाना हक को लेकर विवाद खड़ा करते थे, जिससे मकान बनाने का काम रुक जाता था। हालांकि, अब दस्तावेजों के साथ मालिकाना हक स्पष्ट होने से मकान बनाने का रास्ता पूरी तरह साफ हो गया है।

निष्कर्ष

फतेहपुर बिल्लौच गांव में हुए इस आयोजन ने स्पष्ट कर दिया है कि सरकार अब पुराने रिकॉर्ड को दुरुस्त करने की दिशा में काम कर रही है। हालांकि 148 लाभार्थियों को नए कागज मिलने से खुशी तो है, लेकिन सवाल वही है कि क्या इतने वर्षों बाद मिली यह औपचारिकता वास्तव में ग्रामीणों के जीवन में कोई बड़ा बदलाव लाएगी। फिलहाल प्रशासन ने सभी लाभार्थियों से अपील की है कि वे अपनी मिली हुई जमीन का उपयोग करें और वहां अपने पक्के घर बनाने की प्रक्रिया शुरू करें। गांव में अभी भी काफी प्लॉट खाली पड़े हैं, जिन्हें बसाना प्रशासन और ग्रामीणों दोनों के लिए एक बड़ी चुनौती है।

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