नालंदा की अनूठी पहल की सराहना
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने चर्चित मासिक रेडियो कार्यक्रम 'मन की बात' के 135वें एपिसोड के दौरान बिहार के प्रसिद्ध नालंदा विश्वविद्यालय की विशेष रूप से चर्चा की। पीएम मोदी ने इस संस्थान की मुक्त कंठ से प्रशंसा करते हुए कहा कि नालंदा ने प्राचीन 'शास्त्रार्थ' की परंपरा को पुनर्जीवित कर वर्तमान दौर में एक अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया है। उनके अनुसार, यह प्रयास आधुनिक तकनीक और तेजी से बदलते वैश्विक परिदृश्य के बीच मानवीय रचनात्मकता को सुरक्षित रखने की दिशा में एक बड़ा कदम है।
तकनीक और एआई के दौर में रचनात्मकता की सुरक्षा
अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने याद दिलाया कि आज की दुनिया पूरी तरह से तकनीक और AI जैसे आधुनिक नवाचारों पर टिकी है। उन्होंने 19 जून 2024 के उस ऐतिहासिक दिन का स्मरण किया जब उन्होंने राजगीर में नालंदा विश्वविद्यालय के नए परिसर का उद्घाटन किया था। प्रधानमंत्री ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि इस तकनीकी युग में सबसे बड़ी चुनौती यह है कि हम अपनी जड़ों को थामे रखते हुए अपनी मौलिक रचनात्मकता और बौद्धिक क्षमता को कैसे बचाए रखें। उन्होंने जोर देकर कहा कि नालंदा विश्वविद्यालय जिस तरह से भारतीय ज्ञान की पुरानी परंपराओं और आज की आधुनिक शिक्षा प्रणाली के बीच संतुलन बिठा रहा है, उससे देश का भाग्य संवरेगा।
शास्त्रार्थ: केवल संवाद नहीं, वैचारिक मंथन
शास्त्रार्थ की परिभाषा स्पष्ट करते हुए प्रधानमंत्री ने इसे महज बहस का माध्यम मानने से इनकार किया। उन्होंने कहा, 'शास्त्रार्थ' केवल अपनी बात को सही साबित करने या किसी दूसरे पर अपनी राय थोपने का जरिया नहीं है। यह असल में संवाद, तर्क और एक अत्यंत अनुशासित वैचारिक मंथन की प्रक्रिया है। उन्होंने नालंदा विश्वविद्यालय के प्रबंधन को इस बात के लिए बधाई दी कि उन्होंने इस प्राचीन पद्धति को न केवल अपने दीक्षांत समारोहों का हिस्सा बनाया है, बल्कि शैक्षणिक पाठ्यक्रम में भी इसे शामिल किया है। प्रधानमंत्री ने देश के अन्य बड़े शिक्षण संस्थानों और विश्वविद्यालयों से भी अपील की कि वे शिक्षा के क्षेत्र में सार्थक संवाद और वैचारिक विकास के लिए ऐसी गौरवशाली परंपराओं को अपनाने पर गंभीरता से विचार करें।
ऐतिहासिक विरासत का आधुनिक स्वरूप
उल्लेखनीय है कि जून 2024 में प्रधानमंत्री मोदी ने राजगीर की पहाड़ियों के समीप नालंदा विश्वविद्यालय के भव्य और अत्याधुनिक परिसर का लोकार्पण किया था। 12वीं सदी में बख्तियार खिलजी द्वारा इस प्राचीन ज्ञान केंद्र को नष्ट कर दिया गया था, जिसके सदियों बाद इसे फिर से खड़ा किया गया है। वर्तमान में यह परिसर पूरी तरह से Net Zero और पर्यावरण के अनुकूल एक सस्टेनेबल ग्रीन कैंपस के रूप में विकसित किया गया है। आज यहाँ वैश्विक स्तर पर शोध कार्य हो रहे हैं, जहाँ कई देशों के विद्यार्थी एक साथ मिलकर प्राचीन दर्शन, सतत विकास और आधुनिक विज्ञान के विषयों का अध्ययन कर रहे हैं।
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