मानसून और पशुओं के स्वास्थ्य पर खतरा
बारिश का मौसम किसानों और पशुपालकों के लिए खुशहाली की उम्मीद लेकर आता है, लेकिन यह समय दुधारू पशुओं के लिए बीमारियों का बड़ा खतरा भी साथ लाता है। मानसून के दौरान वातावरण में नमी और गंदगी बढ़ने से संक्रमण तेजी से फैलते हैं। यदि पशुपालक इन दिनों में जरा सी भी लापरवाही बरतते हैं, तो स्वस्थ दिखने वाला पशु भी मात्र एक या दो दिन के भीतर दम तोड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि मानसून की शुरुआत, यानी जून के अंतिम सप्ताह से जुलाई के पहले सप्ताह तक का समय पशुओं को बीमारियों से बचाने के लिए सबसे संवेदनशील होता है।
कौन सी हैं वो दो घातक बीमारियां
सतना जिले के नकैला मझगवां ब्लॉक स्थित पशु चिकित्सालय के चिकित्सक डॉ. बालेंद्र सिंह के अनुसार, मानसून के दौरान पशुओं में सबसे ज्यादा खतरा गलघोंटू (Hemorrhagic Septicemia) और लंगड़ा बुखार (Black Quarter) का होता है। ये दोनों ही बीमारियां बैक्टीरिया जनित हैं और बहुत तेजी से एक पशु से दूसरे पशु में फैलती हैं। डॉ. सिंह ने चेतावनी दी है कि ये बीमारियां इतनी अधिक खतरनाक हैं कि समय रहते सही उपचार न मिलने पर पशु की मृत्यु लगभग सुनिश्चित मानी जाती है। संक्रमण के बाद गलघोंटू के मामले में 12 से 24 घंटे और लंगड़ा बुखार के मामलों में 24 से 48 घंटे के भीतर पशु की स्थिति बेहद गंभीर हो जाती है।
बीमारियों की पहचान कैसे करें
पशुपालकों को इन बीमारियों के शुरुआती लक्षणों की जानकारी होना बहुत आवश्यक है ताकि वे समय पर कदम उठा सकें।
- गलघोंटू के लक्षण: इस बीमारी के शिकार पशु को अचानक तेज बुखार आता है। पशु के गले, गर्दन और छाती के निचले हिस्से में सूजन दिखाई देने लगती है। मुंह से लगातार लार का गिरना और सांस लेते समय घरघराहट जैसी आवाज आना इसके मुख्य संकेत हैं।
- लंगड़ा बुखार के लक्षण: इसमें पशु के जांघ, पुट्ठे या कंधे की मांसपेशियों में तेज सूजन आ जाती है, जिसकी वजह से पशु लंगड़ाकर चलने लगता है। यदि सूजन वाली जगह को दबाया जाए, तो उसके अंदर गैस भरी होने के कारण चर-चर जैसी आवाज सुनाई देती है, जो इस रोग की विशिष्ट पहचान है।
बचाव और सुरक्षा का पूरा चक्र
विशेषज्ञों का कहना है कि इन जानलेवा बीमारियों से बचाव का सबसे प्रभावी और अचूक तरीका टीकाकरण है। मानसून की पहली बारिश के बाद ही कई क्षेत्रों में टीकाकरण अभियान शुरू किए जाते हैं, जिनमें पशुपालकों को बढ़-चढ़कर हिस्सा लेना चाहिए। बचाव के लिए निम्नलिखित उपाय अपनाए जाने चाहिए:
- नियमित टीकाकरण: मानसून के आगमन से पहले अपने सभी बड़े और दुधारू पशुओं का वैक्सीनेशन जरूर करवाएं।
- साफ-सफाई का ध्यान: पशुशाला को हमेशा साफ और सूखा रखना अनिवार्य है। नियमित अंतराल पर कीटाणुनाशक दवाओं का छिड़काव करते रहें।
- आइसोलेशन: यदि कोई पशु बीमार नजर आए, तो उसे स्वस्थ पशुओं से तुरंत अलग कर दें ताकि संक्रमण को फैलने से रोका जा सके।
- मृत पशु का निपटान: दुर्भाग्यवश यदि किसी पशु की मौत हो जाए, तो उसके शव को खुले में न फेंकें। शव को गहरे गड्ढे में डालकर उस पर चूना और नमक डालना चाहिए ताकि संक्रमण मिट्टी या हवा के जरिए न फैले।
क्या देसी उपाय कारगर हैं
कई बार पशुपालक घरेलू उपचारों पर निर्भर हो जाते हैं। चिकित्सक स्पष्ट करते हैं कि देसी नुस्खे केवल शुरुआती स्तर पर पशु को अस्थायी राहत दिला सकते हैं, लेकिन इन्हें मुख्य इलाज का विकल्प नहीं माना जा सकता। गलघोंटू की स्थिति में पिपरमिंट, नीलगिरी का तेल, कपूर और सौंठ की भाप देने से पशु को राहत महसूस हो सकती है। वहीं, लंगड़ा बुखार में सूजन वाली जगह को नीम के उबले पानी से धोने या पोटैशियम परमैंगनेट या हाइड्रोजन पेरोक्साइड के घोल से साफ करने से प्राथमिक स्तर पर मदद मिल सकती है। हालांकि, ये उपाय केवल राहत तक सीमित हैं।
इलाज में देरी पड़ सकती है भारी
विशेषज्ञों की साफ सलाह है कि लक्षण दिखते ही देरी न करें और तुरंत पशु चिकित्सक से संपर्क करें। संक्रमण का असर बहुत तेज होता है, इसलिए डॉक्टर द्वारा निर्धारित एंटीबायोटिक उपचार ही एकमात्र विकल्प है। पशुपालकों की थोड़ी सी सतर्कता और समय पर लिया गया निर्णय न केवल पशु की जान बचा सकता है, बल्कि उन्हें होने वाले भारी आर्थिक नुकसान से भी सुरक्षित रख सकता है। मानसून के दौरान पशुओं के खान-पान और स्वास्थ्य पर बारीकी से नजर रखना ही एक सफल पशुपालन की पहचान है।
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