सुल्तानपुर और गांधी परिवार का ऐतिहासिक संबंध
उत्तर प्रदेश का सुल्तानपुर जिला न केवल अपने पौराणिक महत्व के लिए जाना जाता है, बल्कि यह प्रदेश की राजनीति का भी एक बड़ा केंद्र रहा है। इस जिले का गांधी परिवार के साथ राजनीतिक रिश्ता काफी पुराना और गहरा है। सुल्तानपुर और गांधी परिवार के इस जुड़ाव को समझने के लिए हमें इतिहास के पन्नों को पलटना होगा। वरिष्ठ पत्रकार विक्रम बृजेंद्र सिंह के अनुसार, सुल्तानपुर में गांधी परिवार के प्रभाव की नींव अमेठी लोकसभा सीट के माध्यम से पड़ी थी। अमेठी रियासत के राजा राजर्षि रणंजय सिंह और पंडित मोतीलाल नेहरू के बीच बहुत घनिष्ठ संबंध थे। पंडित मोतीलाल नेहरू अमेठी रियासत के वकील के तौर पर काम करते थे, जिसने नेहरू-गांधी परिवार के लिए इस क्षेत्र के दरवाजे खोल दिए थे।
संजय गांधी और राजनीतिक शुरुआत
पंडित मोतीलाल नेहरू द्वारा स्थापित यह रिश्ता पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ता रहा। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का भी सुल्तानपुर से भावनात्मक लगाव था। हालांकि, चुनावी राजनीति की बात करें तो सुल्तानपुर में गांधी परिवार की सक्रिय एंट्री का श्रेय संजय गांधी को जाता है। उन्होंने साल 1976 में सुल्तानपुर से ही अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत की थी। स्थानीय स्तर पर यह भी माना जाता है कि सुल्तानपुर में स्थित चीनी मिल भी गांधी परिवार की ही देन है, जिसने जिले के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
वरुण गांधी का आगमन और अमेठी से अलगाव
समय के साथ राजनीतिक परिस्थितियां बदलती गईं। साल 2010 में सुल्तानपुर को अमेठी जिले से अलग कर दिया गया, जिससे प्रशासनिक और राजनीतिक समीकरणों में बड़ा बदलाव आया। इसके बाद, साल 2014 के लोकसभा चुनाव में संजय गांधी के पुत्र वरुण गांधी ने सुल्तानपुर सीट से अपना नामांकन दाखिल किया। वरुण गांधी का उद्देश्य अपने पिता संजय गांधी के पुराने राजनीतिक गढ़ को एक बार फिर से जीवित करना था। 2014 में सुल्तानपुर की जनता ने वरुण गांधी को अपना प्रतिनिधि चुनकर लोकसभा भेजा, जिससे एक बार फिर गांधी परिवार का सुल्तानपुर के साथ सीधा जुड़ाव स्थापित हो गया।
मेनका गांधी की भूमिका और चुनावी संघर्ष
साल 2019 के लोकसभा चुनावों में गांधी परिवार ने अपनी पारंपरिक सीटों में अदला-बदली की। इस रणनीति के तहत, वरुण गांधी पीलीभीत चले गए और उनकी मां तथा संजय गांधी की पत्नी मेनका गांधी सुल्तानपुर के चुनावी मैदान में उतरीं। भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ते हुए मेनका गांधी ने कांटे की टक्कर में जीत दर्ज की और सुल्तानपुर की सांसद बनीं।
हालिया राजनीतिक बदलाव
राजनीति में उतार-चढ़ाव तो आते ही रहते हैं। साल 2024 के लोकसभा चुनावों में मेनका गांधी ने एक बार फिर सुल्तानपुर से भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार के रूप में अपनी किस्मत आजमाई। हालांकि, इस बार मुकाबला कड़ा था और उन्हें समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार राम भुवाल निषाद के हाथों हार का सामना करना पड़ा। चुनाव के परिणाम चाहे जो भी रहे हों, लेकिन यह स्पष्ट है कि सुल्तानपुर का गांधी परिवार के साथ जो भावनात्मक और राजनीतिक रिश्ता दशकों पहले शुरू हुआ था, वह आज भी चर्चा का विषय बना हुआ है। सुल्तानपुर की गलियों से लेकर वहां की विकास परियोजनाओं तक, गांधी परिवार की छाप आज भी वहां की स्मृतियों में देखी जा सकती है।
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