सरकारी दावों की खुली पोल
मध्य प्रदेश के सीधी जिले में सरकारी स्कूलों के भीतर बच्चों को शुद्ध पेयजल मुहैया कराने के लिए एक विशेष योजना तैयार की गई थी। इस योजना के पीछे मंशा साफ थी कि विद्यार्थियों को स्कूल में ही पीने का साफ पानी मिले, लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों के बिल्कुल विपरीत है। लाखों रुपये की भारी भरकम राशि फूंकने के बाद भी यह व्यवस्था अब पूरी तरह से सवालों के कटघरे में खड़ी है।
काम शुरू होने से पहले ही फेल
योजना के तहत स्कूलों में लगे हैंडपंपों को आधुनिक बनाने का काम किया गया था। इसमें मोटर पंप, पानी की टंकी और टोटी सिस्टम लगाए गए थे ताकि बच्चों को आसानी से पानी मिल सके। हालांकि, स्थिति यह है कि इनमें से अधिकांश सिस्टम या तो चालू ही नहीं हुए या फिर लगाने के कुछ समय बाद ही खराब हो गए। अव्यवस्था का आलम यह है कि जो पैसा सुविधाओं के नाम पर खर्च किया गया, वह सरकारी खजाने की बर्बादी से अधिक कुछ नहीं निकला।
बिना बिजली के मोटर और खाली नल
इस पूरी कार्ययोजना की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि प्रशासन ने कई ऐसे स्कूलों में भी मोटर पंप लगवा दिए, जहां आज तक बिजली का कनेक्शन ही नहीं पहुंचा है। जब बिजली ही नहीं है, तो मोटर का चलना मुमकिन नहीं है। नतीजा यह है कि स्कूलों में लगाए गए नलों से पानी की बूंद भी नहीं गिरती, बल्कि केवल हवा निकलती है।
छात्रों पर भारी पड़ रही लापरवाही
इस प्रशासनिक लापरवाही का सीधा असर नन्हे-मुन्ने छात्र-छात्राओं पर पड़ रहा है। स्कूल में पानी की सुविधा न होने के कारण बच्चे अपनी प्यास बुझाने के लिए घर से पानी की बोतलें लाने को मजबूर हैं। बुनियादी सुविधा के अभाव में छात्रों का कीमती समय और ऊर्जा व्यर्थ हो रही है, जबकि जिम्मेदार अधिकारी इस ओर आंखें मूंदे बैठे हैं।
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