खरगोन का रहस्यमयी देवगढ़
मध्य प्रदेश का खरगोन जिला न केवल अपनी सांस्कृतिक विरासत के लिए जाना जाता है, बल्कि यह क्षेत्र अपनी अद्भुत धार्मिक मान्यताओं के कारण भी तीर्थ यात्रियों को अपनी ओर खींचता है। इसी जिले में एक छोटा सा गांव है चोली, जिसे स्थानीय लोग देवों की नगरी यानी देवगढ़ के नाम से भी पुकारते हैं। इस गांव की सबसे बड़ी पहचान यहां स्थित वह अति प्राचीन शिव मंदिर है, जिसे लेकर दूर-दूर तक किवदंतियां प्रचलित हैं। लोग इस मंदिर को ओंकारेश्वर मंदिर के नाम से ही जानते हैं, क्योंकि यहां विराजित शिवलिंग का रंग, रूप और आकार बिल्कुल ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग की तरह ही है।
साक्षात ओंकारेश्वर जैसा अनुभव
इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि जो श्रद्धालु किसी कारणवश ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग तक नहीं पहुंच पाते, वे चोली गांव पहुंचकर ही भगवान के दर्शन का लाभ प्राप्त करते हैं। स्थानीय लोगों और श्रद्धालुओं का अटूट विश्वास है कि इस पावन धाम में दर्शन करने का पुण्य फल बिल्कुल उतना ही मिलता है, जितना कि ओंकारेश्वर जाकर मिलता है। यही कारण है कि इसे अक्सर मध्य प्रदेश का दूसरा ओंकारेश्वर भी कहा जाता है। साल भर यहां आस्थावानों का तांता लगा रहता है, जो अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए यहां शीश झुकाने आते हैं।
गर्भगृह का अद्भुत नजारा
यह मंदिर गांव के प्रसिद्ध गोरी सोमनाथ मंदिर के पास एक तालाब के तट पर स्थित है। मंदिर का आकार बहुत विशाल नहीं है, लेकिन इसकी दिव्यता किसी बड़े तीर्थ से कम नहीं है। गर्भगृह तक पहुंचने के लिए भक्तों को कुछ सीढ़ियां नीचे उतरनी पड़ती हैं। वहां पहुंचते ही भक्त शिवलिंग के अद्भुत रूप को देखकर चकित रह जाते हैं। पहली बार में तो यह पहचान पाना ही असंभव सा लगता है कि यह ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग है या चोली का मंदिर। दोनों के स्वरूप में इतनी अधिक समानता है कि साधारण आंखों से इनके बीच अंतर ढूंढना बहुत कठिन है।
धार्मिक ग्रंथों में महिमा का वर्णन
इस प्राचीन शिवलिंग को लेकर ग्रामीणों में गहरा सम्मान है। किशोर ठाकुर नाम के एक ग्रामीण का कहना है कि यह शिवलिंग अत्यंत प्राचीन काल का है और कुछ मान्यताएं तो यहां तक कहती हैं कि इसकी स्थापना का समय ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग के ही कालखंड के समान है। शिव पुराण जैसे पवित्र धार्मिक ग्रंथों में भी इस विशेष स्थान का उल्लेख मिलता है, जो इस स्थान की महत्ता को और अधिक बढ़ा देता है। सावन का महीना हो, महाशिवरात्रि का पर्व हो या फिर प्रत्येक सोमवार का दिन, यहां भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है और पूरा क्षेत्र शिव के जयकारों से गूंज उठता है।
विशेषज्ञों की राय और अंतर
इस संदर्भ में ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर के मुख्य पुजारी पंडित डंकेश्वर दीक्षित का भी मानना है कि चोली का यह शिवलिंग वाकई में काफी प्राचीन है और ओंकारेश्वर के प्रतिरूप के समान ही है। हालांकि, वे एक महत्वपूर्ण अंतर की ओर इशारा करते हुए कहते हैं कि ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग का आकार काफी विशाल है, जबकि चोली का शिवलिंग आकार में थोड़ा छोटा है। फिर भी, धार्मिक महत्व और स्वरूप की समानता के कारण चोली के ओंकारजी को भी उसी श्रद्धा और भाव से पूजा जाता है जैसे कि मुख्य ज्योतिर्लिंग को। यह मंदिर न केवल आस्था का केंद्र है, बल्कि भारतीय संस्कृति और प्राचीन शिल्पकला की एक अमूल्य धरोहर भी है।
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