गांव की दीवारें अब बना रही हैं भविष्य
छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में शिक्षा को लेकर एक ऐसी अनूठी और सराहनीय पहल देखने को मिल रही है, जो पूरे राज्य में चर्चा का विषय बनी हुई है। आमतौर पर शिक्षा का मतलब स्कूल की कक्षाओं और किताबों तक ही सीमित माना जाता है, लेकिन बिलासपुर के बेलतरा क्षेत्र में स्थित सेलर गांव ने इस धारणा को पूरी तरह बदल कर रख दिया है। यहां के निवासियों ने तय किया है कि ज्ञान केवल एक कमरे में कैद नहीं रहना चाहिए, इसलिए पूरे गांव को ही एक खुली पाठशाला का रूप दे दिया गया है।
हर गली में छिपा है ज्ञान
इस गांव में कदम रखते ही आपको दीवारों पर कोई सामान्य चित्र या विज्ञापन नहीं, बल्कि प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्न और उनके उत्तर दिखाई देंगे। सेलर गांव की हर गली की दीवार को एक किताब की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। बच्चे जब स्कूल जाते हैं या खेलकूद के लिए बाहर निकलते हैं, तो अनजाने में ही उनकी नजरें इन सवालों पर पड़ती हैं। यह तरीका उन्हें पढ़ाई के प्रति जागरूक करने के साथ ही हर पल कुछ नया सीखने के लिए प्रेरित कर रहा है। बच्चों के लिए यह एक रोचक अनुभव है, जहां वे चलते-फिरते अपने सामान्य ज्ञान को मजबूत कर रहे हैं।
सीखने की निरंतरता और नवाचार
इस अनूठी पाठशाला की सबसे बड़ी विशेषता इसका अपडेट होने वाला सिस्टम है। गांव के प्रशासन ने तय किया है कि दीवारों पर लिखे गए सवाल हर तीन महीने में बदल दिए जाएंगे। इस योजना के अनुसार, एक साल के भीतर बच्चों को 180 नए प्रश्नों को पढ़ने और समझने का अवसर मिलेगा। इतना ही नहीं, सिर्फ सवाल लिखने तक ही यह पहल सीमित नहीं है। इन सवालों के आधार पर समय-समय पर प्रतियोगिताएं आयोजित की जाएंगी, ताकि यह पता चल सके कि बच्चों ने कितना सीखा है। बेहतर प्रदर्शन करने वाले छात्रों को पुरस्कृत भी किया जाएगा, जिससे उनमें सीखने के प्रति उत्साह बना रहे।
शिक्षा का नया दृष्टिकोण
सेलर ग्राम पंचायत का यह नवाचार शिक्षा के प्रति एक नई सोच को दर्शाता है। उनका मुख्य उद्देश्य यह है कि पढ़ाई स्कूल की चारदीवारी तक ही सीमित न रहे, बल्कि बच्चा घर के बाहर भी ज्ञान के संपर्क में रहे। बचपन से ही प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी का माहौल मिलने से ग्रामीण परिवेश के बच्चों का आत्मविश्वास बढ़ रहा है। ग्रामीणों और जनप्रतिनिधियों का मानना है कि यदि स्कूली स्तर से ही बच्चे बड़े लक्ष्य की तैयारी करना शुरू कर देंगे, तो भविष्य में वे किसी भी बड़ी प्रतियोगिता में बड़ी आसानी से सफलता हासिल कर सकेंगे।
संसाधनों से परे सकारात्मक बदलाव
इस पहल ने यह साबित कर दिया है कि शिक्षा में बदलाव लाने के लिए हमेशा भारी-भरकम संसाधनों की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि सही सोच और इच्छाशक्ति का होना अधिक जरूरी है। दीवारों को ज्ञान का माध्यम बनाना इस बात का प्रमाण है कि गांव के लोग अपने बच्चों को बड़े पदों पर आसीन यानी ऑफिसर के रूप में देखना चाहते हैं। किताबों के पन्नों से निकलकर अब शिक्षा गांव की गलियों में गूंज रही है। अब आने वाला समय ही बताएगा कि इस अनोखी दीवार-पाठशाला से निकले सवाल कितने बच्चों को उनकी मंजिल तक पहुंचाते हैं। सेलर गांव की यह मिसाल दूसरे गांवों के लिए भी एक प्रेरणा है कि कैसे छोटे से प्रयास से बड़े सामाजिक परिवर्तन लाए जा सकते हैं।
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