सांप्रदायिक सौहार्द की अद्भुत मिसाल
उत्तर प्रदेश के बलिया जिले से एक ऐसी खबर सामने आई है जो देश भर में भाईचारे और आपसी विश्वास की मिसाल बनी हुई है। धर्म और मजहब की दीवारों को लांघकर इंसानियत की सेवा और आस्था के सम्मान का यह उदाहरण बेहद खास है। आम तौर पर मोहर्रम पर ताजिया निकालने का कार्य मुस्लिम समुदाय के लोग करते हैं, लेकिन बलिया में एक ऐसा हिंदू परिवार है जो पिछले 10 पीढ़ियों से इस परंपरा को पूरी निष्ठा के साथ निभा रहा है। यह परिवार न केवल इस परंपरा को आगे बढ़ा रहा है, बल्कि समाज को एकता का एक बड़ा संदेश भी दे रहा है।
कानूनी लड़ाई और जीत
इस परंपरा के सफर में चुनौतियां भी कम नहीं थीं। परिवार के वर्तमान सदस्य शिव कुमार गुप्ता, जो जगदीशपुर के निवासी हैं, बताते हैं कि उनके पूर्वजों ने जिस परंपरा की शुरुआत की थी, उसे आज भी पूरी शिद्दत से निभाया जा रहा है। उन्होंने बताया कि इस धार्मिक कार्य को रोकने के लिए उनके परिवार पर पूर्व में मुकदमे भी किए गए थे, लेकिन सत्य और आस्था की जीत हुई। उन्होंने बताया कि इस मामले में उन्हें इलाहाबाद हाई कोर्ट से बड़ी जीत मिली थी। इतना ही नहीं, अदालत और मजिस्ट्रेट के फैसले के बाद यह स्पष्ट कर दिया गया था कि इस परिवार की ताजिया जुलूस में सबसे आगे रहेगी। परिवार के पास इस जीत से संबंधित आधिकारिक कानूनी दस्तावेज और डिग्री भी सुरक्षित है, जो इस परंपरा की ऐतिहासिकता को प्रमाणित करती है।
मन्नत पूरी होने से हुई थी शुरुआत
शिव कुमार गुप्ता के अनुसार, उनके पूर्वजों ने किसी विशेष मन्नत के पूरा होने के बाद ताजिया निकालने की शुरुआत की थी। यह कोई मामूली रस्म नहीं, बल्कि उनके परिवार के लिए एक अटूट विश्वास है। उन्होंने विश्वास जताया कि आने वाली पीढ़ियां भी इसी तरह से इस परंपरा को जारी रखेंगी। उनका मानना है कि मुस्लिम भाइयों के साथ उनका रिश्ता बेहद आत्मीय है और यह सौहार्द सदियों से चला आ रहा है।
सामाजिक एकता का संदेश
इस अनूठी परंपरा पर राजेश कुमार गुप्ता का कहना है कि यह हिंदू-मुस्लिम एकता का एक ऐसा उदाहरण है जिसे हर किसी को अपनाना चाहिए। उन्होंने कहा कि समाज में जाति-पाति और भेदभाव के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए। मोहर्रम के दौरान जब मुस्लिम भाई गम और मातम मनाते हैं, तब यह हिंदू परिवार भी उनके दुख में शामिल होकर ताजिया को सम्मान देता है। उन्होंने विस्तार से बताया कि ताजिया निकालने की प्रक्रिया कई दिनों तक चलती है। पहले दिन कर्बला से मिट्टी लाई जाती है, दूसरे दिन चौक पर तैयारी होती है, और तीसरे दिन मुख्य ताजिया रखी जाती है जिसे कत्ल की रात के रूप में जाना जाता है। चौथा दिन दफन का होता है, जब ताजिया विसर्जन की रस्म पूरी की जाती है।
नई पीढ़ी का उत्साह
इस परंपरा में परिवार के बच्चे भी बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं। परिवार की छोटी बच्ची पल्लवी गुप्ता ने साझा किया कि उनके घर से ताजिया निकलते देख उन्हें काफी गर्व और खुशी महसूस होती है। उन्होंने कहा कि उनके दादा और परदादा जिस परंपरा को निभाते आए हैं, उसे देखकर ही वे बड़े हो रहे हैं। उनके अनुसार, सभी को मिलजुल कर और शांति के साथ एक-दूसरे के त्योहारों का सम्मान करते हुए रहना चाहिए। यह खबर बलिया की उस गंगा-जमुनी तहजीब को दर्शाती है, जहां आस्था के रंग एक दूसरे के साथ मिलकर एक खूबसूरत तस्वीर पेश करते हैं।
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