राजस्थान के लिए जीवनदायिनी चंबल नदी का सफर, जानिए कहां से निकलती है और कहां जाकर मिलती है?

मध्य प्रदेश की पहाड़ियों से शुरू होकर चंबल नदी कैसे राजस्थान के खेतों में हरियाली लाती है और फिर उत्तर प्रदेश में जाकर यमुना में समा जाती है, इसका पूरा सफर जानना हर किसी के लिए दिलचस्प है।

चंबल नदी का उद्गम और शुरुआत

चंबल नदी का गौरवशाली सफर मध्य प्रदेश की विंध्याचल पर्वतमाला के जनापाव क्षेत्र से प्रारंभ होता है। यह नदी अपने उद्गम स्थल से निकलकर जब आगे बढ़ती है, तो मानसून के दौरान इसका रौद्र रूप देखने को मिलता है और यह पूरी तरह उफान पर रहती है।

बांधों का सिलसिला और जलविद्युत

नदी के बहाव के रास्ते में कई बड़े बांध बनाए गए हैं जो सिंचाई और बिजली के उत्पादन में अहम भूमिका निभाते हैं। नदी का पानी सबसे पहले गांधी सागर बांध में संचित होता है। इसके बाद यह क्रमवार तरीके से राणा प्रताप सागर और जवाहर सागर बांध से होकर गुजरती है। इन तीनों प्रमुख बांधों का मुख्य उद्देश्य जलविद्युत का उत्पादन करना है, जिससे क्षेत्र को ऊर्जा मिलती है।

कोटा बैराज से सिंचाई और पेयजल का वितरण

इस यात्रा का अंतिम महत्वपूर्ण पड़ाव कोटा बैराज है। यहीं से जल प्रबंधन की एक जटिल व्यवस्था काम करती है। बैराज से दो मुख्य नहरें निकाली गई हैं, एक दाईं ओर और दूसरी बाईं ओर। इन नहरों के माध्यम से राजस्थान और मध्य प्रदेश के दूर-दराज के खेतों की सिंचाई की जाती है। इसके अतिरिक्त, कई शहरों के लिए चंबल का पानी पेयजल का मुख्य स्रोत भी है।

यमुना में मिलन

अपनी लंबी यात्रा पूरी करने के बाद, कोटा बैराज से छोड़ा गया अतिरिक्त पानी आगे की ओर बढ़ता है। अपनी निरंतर यात्रा के अंत में यह नदी उत्तर प्रदेश के इटावा के समीप पहुंचती है, जहां यह अंततः यमुना नदी में जाकर मिल जाती है। इस प्रकार एक छोटी जलधारा से शुरू हुई चंबल एक विशाल नदी का रूप लेकर यमुना के साथ एकाकार हो जाती है।

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