फसलों की सुरक्षा के लिए पारंपरिक तरीका
उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले समेत कई इलाकों में इन दिनों आवारा जानवरों का आतंक काफी बढ़ गया है, जिससे किसानों की फसलें बड़े पैमाने पर बर्बाद हो रही हैं। अपनी मेहनत की कमाई को इन जानवरों से बचाने के लिए किसान तरह-तरह के जतन करते हैं। लोहे की तार वाली फेंसिंग करवाना हर किसी के लिए मुमकिन नहीं है, क्योंकि इसमें हजारों रुपये का खर्च आता है। ऐसे में आज हम आपको एक ऐसे देसी और बेहद प्रभावी तरीके के बारे में बता रहे हैं, जिसे अपनाकर आप बिना किसी बड़े निवेश के खेत को सुरक्षित बना सकते हैं। यह तरीका है बेशर्म यानी बेहया के पौधे का उपयोग करना, जिसे खेत की मेड़ पर लगाकर एक प्राकृतिक सुरक्षा दीवार बनाई जा सकती है।
क्या है बेशर्म का पौधा और यह क्यों है उपयोगी
बेशर्म का पौधा, जिसे कई क्षेत्रों में बेहया के नाम से भी जाना जाता है, एक तेजी से बढ़ने वाली झाड़ी है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह बहुत कम समय में एक घनी झाड़ी का आकार ले लेता है। इसकी टहनियां आपस में इतनी उलझ जाती हैं कि खेत के चारों ओर एक अभेद्य प्राकृतिक दीवार तैयार हो जाती है। जब यह झाड़ी बड़ी हो जाती है, तो नीलगाय जैसे बड़े जानवरों और अन्य आवारा मवेशियों के लिए खेत में घुसना लगभग असंभव हो जाता है। यही कारण है कि अब कई किसान अपनी फसल की रखवाली के लिए इस पौधे को प्राथमिकता देने लगे हैं।
कम लागत में बेहतरीन सुरक्षा का विकल्प
आज के दौर में लोहे की जाली या तार की फेंसिंग लगवाना एक छोटे और मध्यम वर्गीय किसान की आर्थिक स्थिति के लिए काफी चुनौतीपूर्ण होता है। लोहे की फेंसिंग की लागत इतनी अधिक है कि वह खेत की कुल उपज के लाभ को कम कर देती है। इसकी तुलना में बेशर्म का पौधा एक मुफ्त और टिकाऊ समाधान है। इस पौधे को लगाने के लिए आपको कहीं से खाद या महंगे बीज खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती है। यदि आसपास कहीं भी बेशर्म का पौधा मौजूद है, तो उसकी टहनियां काटकर ही आप उसे अपने खेत की मेड़ पर रोप सकते हैं। नमी मिलते ही ये टहनियां जड़ पकड़ लेती हैं और बहुत कम देखभाल में तेजी से बढ़ने लगती हैं।
रोपण की सही विधि और समय
इस पौधे को लगाने की प्रक्रिया अत्यंत सरल है। किसान इसकी 1 से 2 फीट लंबी स्वस्थ टहनियां चुन सकते हैं। इन टहनियों को खेत की मेड़ पर आपस में 2 से 3 फीट की दूरी पर गाड़ना चाहिए। वैसे तो यह पौधा कहीं भी पनप जाता है, लेकिन बरसात का मौसम इसकी रोपाई के लिए सबसे उत्तम माना गया है। बारिश के दौरान मिट्टी में पर्याप्त नमी होती है, जिससे पौधे बहुत जल्दी जड़ें जमा लेते हैं। शुरुआती कुछ दिनों में अगर आप हल्की सिंचाई की व्यवस्था कर सकें, तो इनकी वृद्धि और भी बेहतर होती है। कुछ ही महीनों में ये टहनियां आपस में मिलकर एक घनी और मजबूत दीवार का रूप ले लेती हैं।
देखभाल और छंटाई का महत्व
बेशर्म के पौधे की सबसे बड़ी खूबी इसकी सहनशीलता है। इसे बार-बार खाद देने या लगातार पानी पिलाने की कोई आवश्यकता नहीं होती। यह प्राकृतिक रूप से अपना पोषण प्राप्त कर लेता है। हालांकि, इसे एक हद तक नियंत्रित रखना भी जरूरी है। किसान समय-समय पर इसकी छंटाई करते रहें, जिससे झाड़ी और अधिक घनी हो जाती है। कटाई के दौरान जो टहनियां निकलती हैं, उन्हें फेंकने के बजाय आप नए पौधे तैयार करने के काम में ला सकते हैं। ध्यान रखें कि पौधा इतना न फैले कि वह खुद खेत के भीतर या पड़ोसी की जमीन पर अतिक्रमण करने लगे। नियमित छंटाई ही इसे व्यवस्थित बनाए रखने का सबसे अच्छा उपाय है।
पर्यावरण और मिट्टी के लिए भी लाभकारी
यह पौधा केवल सुरक्षा ही नहीं देता, बल्कि पर्यावरण को भी कई लाभ पहुंचाता है। इसकी जड़ें मिट्टी को मजबूती से जकड़ कर रखती हैं, जिससे बारिश के दौरान होने वाला कटाव काफी हद तक कम हो जाता है। घनी झाड़ियों के कारण खेतों के आसपास हरियाली बनी रहती है, जो एक स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र के लिए जरूरी है। ये झाड़ियां छोटे पक्षियों और कई तरह के उपयोगी कीटों को भी प्राकृतिक आश्रय प्रदान करती हैं।
जानवरों को दूर रखने का वैज्ञानिक और जैविक कारण
जानवरों के खेत से दूर रहने का मुख्य कारण इस पौधे की तीखी दुर्गंध है। बेशर्म के पौधे से एक खास गंध आती है, जो जानवरों को कतई पसंद नहीं होती। चाहे नीलगाय हो, जंगली जानवर हों या कोई पालतू पशु, कोई भी इस पौधे के करीब फटकना पसंद नहीं करता। इसे अंग्रेजी में आइटामिया के नाम से जाना जाता है। यदि किसान अपने खेत की चारों दिशाओं में इस पौधे की सघन कतार लगा दें, तो जानवर खेत में प्रवेश करने के बजाय बाहर से ही लौट जाते हैं। इस तरह बिना किसी रासायनिक छिड़काव या महंगी सुरक्षा तकनीक के, फसल पूरी तरह से सुरक्षित रहती है और किसान रात भर खेत की रखवाली करने के मानसिक बोझ से भी मुक्त हो जाते हैं।
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