क्या इंदिरा गांधी ने कच्चातिवु द्वीप श्रीलंका को उपहार में दिया था? जानें इस विवाद का पूरा इतिहास और वर्तमान राजनीति

बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे के हालिया दावों ने कच्चातिवु द्वीप विवाद को फिर से चर्चा में ला दिया है, जिसमें 1974 के भारत-श्रीलंका समझौते की कानूनी वैधता पर सवाल उठाए जा रहे हैं।

कच्चातिवु द्वीप पर सियासी घमासान

भारत और श्रीलंका के बीच दशकों से चर्चा का विषय रहा कच्चातिवु द्वीप एक बार फिर से सुर्खियों में है। भारतीय जनता पार्टी के सांसद निशिकांत दुबे द्वारा दिए गए हालिया बयान ने इस मामले को तूल दे दिया है। निशिकांत दुबे ने कांग्रेस और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी पर गंभीर आरोप लगाते हुए दावा किया है कि इस द्वीप को पड़ोसी देश श्रीलंका को एक उपहार के रूप में सौंप दिया गया था। इस विवाद की जड़ें काफी गहरी हैं और यह मुद्दा केवल जमीन के टुकड़े तक सीमित नहीं है, बल्कि तमिलनाडु के मछुआरों के जीवन और आजीविका से सीधा जुड़ा हुआ है।

निशिकांत दुबे का कांग्रेस पर तीखा प्रहार

बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट के माध्यम से इस पूरे प्रकरण को लेकर अपनी बात रखी। उन्होंने 26 जून 1974 की तारीख का जिक्र करते हुए कहा कि उस दिन इंदिरा गांधी ने भारत का कच्चातिवु द्वीप श्रीलंका को दान दे दिया था। निशिकांत दुबे का आरोप है कि इसी फैसले के कारण आज तमिलनाडु के मछुआरों को बड़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। उन्होंने कहा कि श्रीलंकाई सरकार द्वारा इन मछुआरों को लगातार पकड़ा जाता है, जेल में डाला जाता है और प्रताड़ित किया जाता है।

अपनी पोस्ट में दुबे ने आगे दावा किया कि इस मामले की शुरुआत काफी पहले हुई थी। उनके अनुसार, वैश्विक स्तर पर बड़ा नेता बनने की इच्छा के चलते जवाहरलाल नेहरू ने 1957 में ही इस द्वीप को श्रीलंका को देने का मन बना लिया था। दुबे ने बताया कि 1961 में नेहरू इस समझौते पर दस्तखत करना चाहते थे, लेकिन उस समय विदेश मंत्रालय और कानून मंत्रालय ने इसका कड़ा विरोध किया था। इसके बाद नेहरू के निधन के बाद इंदिरा गांधी ने इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाया। निशिकांत दुबे का यह भी आरोप है कि 1974 के इस समझौते के दौरान तमिलनाडु के तत्कालीन मुख्यमंत्री एम. करुणानिधि को पूरी तरह अंधेरे में रखा गया था। उनका कहना है कि 20 जून 1974 को चेन्नई भेजे गए विदेश सचिव ने वहां के मुख्य सचिव को धमकाकर इस समझौते पर सहमति ली थी। दुबे का तर्क है कि किसी भी विदेशी देश को अपनी जमीन सौंपने के लिए संसद में कानून पारित करना अनिवार्य है, जैसा कि सुप्रीम कोर्ट का चिकन नेक मामले में आदेश है, लेकिन कांग्रेस ने संविधान की अनदेखी की।

कच्चातिवु द्वीप का भौगोलिक और सामरिक महत्व

सवाल यह उठता है कि आखिर कच्चातिवु द्वीप इतना महत्वपूर्ण क्यों है? भौगोलिक दृष्टि से यह द्वीप भारत और श्रीलंका के बीच पाक जलडमरूमध्य (Palk Strait) में स्थित है। यह द्वीप भारत के रामेश्वरम से लगभग 33 किलोमीटर की दूरी पर है, जबकि श्रीलंका के जाफना से इसकी दूरी करीब 62 किलोमीटर है। कुल 285 एकड़ क्षेत्र में फैला यह द्वीप एक निर्जन टापू है। यहां कोई स्थायी आबादी नहीं रहती है क्योंकि पीने के पानी का कोई उपयुक्त स्रोत वहां मौजूद नहीं है। हालांकि, भारतीय मछुआरों के लिए यह एक महत्वपूर्ण पड़ाव रहा है। वे समुद्र में मछली पकड़ने के दौरान थकान मिटाने और अपने जाल सुखाने के लिए इस टापू का उपयोग करते आए हैं।

धार्मिक महत्व भी है इस द्वीप का

भौगोलिक और राजनीतिक पहलुओं के अलावा, इस द्वीप का अपना एक विशिष्ट धार्मिक महत्व भी है। यहां 20वीं सदी में निर्मित एक सेंट एंथोनी कैथोलिक चर्च स्थित है। इस चर्च का अपना धार्मिक महत्व है और हर साल यहां एक उत्सव का आयोजन किया जाता है, जिसमें बड़ी संख्या में भारत और श्रीलंका के ईसाई श्रद्धालु भाग लेने आते हैं। यह सांस्कृतिक मेलजोल का भी एक प्रमुख केंद्र माना जाता है।

विवाद का लंबा इतिहास

कच्चातिवु के मालिकाना हक को लेकर अस्पष्टता की कहानी सदियों पुरानी है। 17वीं सदी में यह द्वीप मदुरै के रामनाद साम्राज्य के जमींदारों के नियंत्रण में हुआ करता था। बाद में ब्रिटिश शासन के दौरान यह मद्रास प्रेसीडेंसी का हिस्सा बन गया। हालांकि, श्रीलंका भी लंबे समय से इस पर अपना दावा जताता रहा है। साल 1921 में जब दोनों देश ब्रिटिश उपनिवेश थे, तब मछली पकड़ने की सीमाओं को लेकर दोनों पक्षों के बीच विवाद हुआ था। उस समय ब्रिटिश अधिकारियों ने कई दौर की बैठकें कीं, लेकिन विवाद का कोई ठोस समाधान नहीं निकल सका और मामला अनसुलझा ही रहा।

1974 और 1976 के समझौते

भारत और श्रीलंका के बीच कच्चातिवु को लेकर सबसे महत्वपूर्ण मोड़ 26 जून 1974 को आया, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और श्रीलंका की प्रधानमंत्री सिरिमावो भंडारनायके ने एक समझौते पर हस्ताक्षर किए। इस समझौते के जरिए भारत ने आधिकारिक रूप से कच्चातिवु द्वीप को श्रीलंका का हिस्सा मान लिया। हालांकि, इस समझौते के तहत यह शर्त रखी गई थी कि भारतीय मछुआरे बिना वीजा के वहां जा सकते हैं, अपना जाल सुखा सकते हैं और चर्च के उत्सव में शामिल हो सकते हैं। लेकिन साल 1976 में हुए एक और समझौते ने स्थिति बदल दी। इस समझौते ने एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक जोन को परिभाषित किया और दोनों देशों के मछुआरों को एक-दूसरे के समुद्री क्षेत्र में मछली पकड़ने से प्रतिबंधित कर दिया। इसके बाद से ही श्रीलंकाई नौसेना कच्चातिवु को अपना एकाधिकार मानने लगी और भारतीय मछुआरों की परेशानी शुरू हो गई।

तमिलनाडु सरकार का कड़ा विरोध और कानूनी लड़ाई

तमिलनाडु की सरकारों ने हमेशा से इस समझौते का विरोध किया है। राज्य के नेताओं का तर्क रहा है कि यह द्वीप ऐतिहासिक रूप से रामनाद साम्राज्य का हिस्सा था और बाद में भारत का अभिन्न अंग बना। 1974 में जब इंदिरा गांधी सरकार ने यह कदम उठाया, तो तत्कालीन मुख्यमंत्री एम. करुणानिधि ने इसका जोरदार विरोध किया था और सरकार से आग्रह किया था कि द्वीप को न सौंपा जाए।

बाद के वर्षों में, 1991 में जे. जयललिता के नेतृत्व वाली सरकार ने तमिलनाडु विधानसभा में कच्चातिवु को वापस लेने की मांग करते हुए एक प्रस्ताव पारित किया था। विपक्षी दलों ने भी इस मुद्दे पर सरकार का समर्थन किया था। साल 2008 में जयललिता ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर 1974 और 1976 के समझौतों की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी। उन्होंने 1960 के बेरुबारी मामले का हवाला देते हुए कहा कि संसद में संविधान संशोधन के बिना देश की कोई भी जमीन किसी दूसरे देश को हस्तांतरित नहीं की जा सकती। फिलहाल, यह मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है और इस पर अभी तक कोई अंतिम फैसला नहीं आया है। आज यह मुद्दा केवल एक टापू का मालिकाना हक नहीं, बल्कि लाखों भारतीय मछुआरों की रोजी-रोटी और उनकी सुरक्षा का एक बड़ा संकट बना हुआ है, जो अक्सर अनजाने में अंतरराष्ट्रीय सीमा पार कर जाने पर गिरफ्तार कर लिए जाते हैं।

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