भरतपुर की पहचान है जगरे वाली बाटी
राजस्थान के भरतपुर जिले में खानपान की जब भी बात होती है तो जगरे वाली बाटी का जिक्र सबसे पहले आता है। यह व्यंजन केवल एक पकवान नहीं, बल्कि यहां की संस्कृति और परंपरा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस बाटी की सबसे बड़ी विशेषता इसका देसी स्वाद है, जो इसे आधुनिक ओवन या गैस पर बनी बाटियों से बिल्कुल अलग बनाता है। उपलों की धीमी आंच पर पकने के कारण इसमें एक सोंधी और धुएं जैसी खुशबू बस जाती है, जो इसे खाने वालों के लिए एक यादगार अनुभव बना देती है। भरतपुर के शहरी और ग्रामीण दोनों इलाकों में यह व्यंजन लोगों की पहली पसंद है और खास मौकों व त्यौहारों पर घरों में इसे बड़े चाव से बनाया जाता है।
क्यों खास है उपलों पर पकी बाटी
जगरे वाली बाटी को तैयार करने का तरीका बेहद पुराना और पारंपरिक है। इसे आधुनिक उपकरणों के बजाय जगरे यानी उपलों (गोबर के उपले) की आंच पर पकाया जाता है। जब उपले जलकर लाल अंगारों में बदल जाते हैं, तब इन बाटियों को उन पर रखा जाता है। धीमी आंच पर धीरे-धीरे सिकने के कारण ये बाहर से कुरकुरी और सुनहरी हो जाती हैं, जबकि अंदर से उतनी ही मुलायम बनी रहती हैं। इस प्रक्रिया में बाटी में जो धुएं का फ्लेवर आता है, वही इसे सामान्य बाटी की तुलना में कहीं अधिक स्वादिष्ट और लाजवाब बनाता है। यही कारण है कि आज भी लोग आधुनिक जीवनशैली के बीच इस पुरानी परंपरा को संजोए हुए हैं।
बाटी बनाने की पारंपरिक विधि
अगर आप घर पर इस लज़ीज़ व्यंजन का आनंद लेना चाहते हैं, तो इसकी प्रक्रिया को समझना बहुत जरूरी है। बाटी का आटा तैयार करने के लिए सबसे पहले गेहूं के आटे में उचित मात्रा में बेसन मिलाया जाता है। स्वाद को और बेहतर बनाने के लिए इसमें सौंफ और अजवाइन का उपयोग किया जाता है। एक खास टिप यह है कि आटे को पानी के बजाय दूध के साथ गूंथा जाता है, जिससे बाटी का टेक्सचर बहुत मुलायम हो जाता है और खाने में यह दोगुना स्वादिष्ट लगती है।
- आटे को दूध के साथ गूंथकर इसके छोटे-छोटे गोल गोले तैयार कर लिए जाते हैं।
- इसके बाद जमीन पर उपलों को इकठ्ठा करके आग जलाई जाती है।
- जब उपले पूरी तरह जलकर लाल अंगारों का रूप ले लेते हैं, तब आटे के गोलों को उनके बीच दबा दिया जाता है।
- धीमी आंच पर इन बाटियों को पलटा जाता है ताकि वे चारों तरफ से समान रूप से सिक सकें।
- पकने के बाद इन्हें बाहर निकालकर साफ कपड़े से अच्छी तरह पोंछ लिया जाता है।
परफेक्ट परोसने का अंदाज
जगरे वाली बाटी का असली स्वाद तब तक अधूरा है, जब तक इसे शुद्ध देसी घी में न डुबोया जाए। घी में अच्छी तरह डूबने के बाद यह बाटी खाने में बेहद मुलायम और रसीली हो जाती है। इसे आमतौर पर तीखी लहसुन की चटनी या गाढ़ी दाल के साथ गरमा-गरम परोसा जाता है। यह संयोजन न केवल भरतपुर के लोगों का पसंदीदा भोजन है, बल्कि वहां आने वाले पर्यटकों को भी अपनी ओर आकर्षित करता है। राजस्थान भर में अलग-अलग तरह की बाटियां बनाई जाती हैं, लेकिन भरतपुर की जगरे वाली बाटी का देसी अंदाज और बनाने की पारंपरिक कला इसे बाकी जगहों से अलग और खास बनाती है।
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