हेलीकॉप्टर वाला ताजिया बना चर्चा का विषय
बिहार के गया जिले के इमामगंज प्रखंड के झिकटिया गांव में इस वर्ष मुहर्रम के मौके पर एक विशेष ताजिया लोगों के बीच कौतूहल और आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। इस ताजिया की सबसे बड़ी विशेषता इसका हेलीकॉप्टर के आकार का ढांचा है, जिसे देखने के लिए दूर-दराज के गांवों से लोग उमड़ रहे हैं। इस अनोखी कलाकृति का निर्माण गांव के ही निवासी और पेशे से बढ़ई प्रदीप शर्मा ने किया है। हिंदू समुदाय से ताल्लुक रखने वाले प्रदीप शर्मा की इस पहल को क्षेत्र में सामाजिक सौहार्द और भाईचारे के एक बेहतरीन उदाहरण के रूप में देखा जा रहा है।
दस वर्षों से कर रहे हैं कला का प्रदर्शन
प्रदीप शर्मा कोई नए कारीगर नहीं हैं, बल्कि वे पिछले करीब 10 वर्षों से लगातार मुहर्रम के लिए ताजिया बनाने का काम कर रहे हैं। उनकी कार्यशैली यह है कि वे हर साल कुछ नया करने की कोशिश करते हैं और ताजिया के डिजाइन में बदलाव लाते हैं। इस बार उन्होंने अपनी रचनात्मकता दिखाते हुए इसे हेलीकॉप्टर का स्वरूप दिया है। ग्रामीणों का मानना है कि प्रदीप की यह मेहनत न केवल उनकी शिल्पकला का प्रमाण है, बल्कि यह समाज में आपसी सम्मान और एकता का संदेश भी देती है। बांस, लकड़ी, रंगीन कागज और कपड़े के कुशल उपयोग से बनी यह संरचना आसपास के निवासियों के लिए प्रशंसा का विषय बन गई है।
मुहर्रम और ताजिया का धार्मिक महत्व
इस्लामिक कैलेंडर का पहला महीना मुहर्रम इस्लाम धर्म में अत्यंत पवित्र माना जाता है। यह महीना केवल नए वर्ष के आगमन का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह सब्र, त्याग, न्याय और इमाम हुसैन की शहादत की याद में आत्म-चिंतन और शोक व्यक्त करने का अवसर भी है। मुहर्रम की दसवीं तारीख को कर्बला के मैदान में इमाम हुसैन और उनके साथियों की शहादत हुई थी। उसी की याद में ताजिया का जुलूस निकाला जाता है। ताजिया मुख्य रूप से इमाम हुसैन के मकबरे का एक प्रतीकात्मक मॉडल होता है, जिसे बांस, लकड़ी, कपड़े और रंगीन कागजों से सजाया जाता है।
पारंपरिक कारीगरों की पीढ़ियां
गया जिले में ताजिया निर्माण की एक समृद्ध परंपरा रही है और यहां कई पेशेवर कारीगर इस कला को संजोए हुए हैं। इन्हीं में से एक नाम आमस प्रखंड के बैदा गांव के निवासी मोहम्मद मोइनुद्दीन अंसारी का है। उनका परिवार चौथी पीढ़ी से ताजिया बनाने के काम में जुड़ा हुआ है। मुहर्रम के दिनों में उनके पास आसपास के लगभग आधा दर्जन गांवों से ताजिया बनाने के ऑर्डर आते हैं। मोहम्मद मोइनुद्दीन के दादा सुखाडी मियां और पिता रसूल अंसारी से शुरू हुआ यह हुनर अब उनके बच्चों तक पहुंच चुका है।
प्रसिद्ध कारीगर मोइनुद्दीन की कला
मोइनुद्दीन अंसारी का काम पूरे शेरघाटी अनुमंडल और गया जिले में अपनी फिनिशिंग और सुंदरता के लिए जाना जाता है। शेरघाटी के प्रमुख अखाड़ों के लोग विशेष रूप से उन्हीं से ताजिया बनवाना पसंद करते हैं। मोइनुद्दीन अपनी ताजिया को और अधिक आकर्षक बनाने के लिए आधुनिक तकनीक का भी उपयोग करते हैं। वे ताजिया में इलेक्ट्रिक कनेक्शन और रंग-बिरंगी लाइटें लगाते हैं, जिससे वे रात के समय भी जगमगा उठते हैं। हालांकि, स्वास्थ्य संबंधी कारणों से अब मोइनुद्दीन ने काम की गति और संख्या थोड़ी सीमित कर दी है। पहले वे एक सत्र में लगभग 50 से अधिक छोटी-बड़ी ताजिया बना लिया करते थे, लेकिन अब वे मुख्य रूप से शेरघाटी क्षेत्र के बड़े अखाड़ों के लिए ही काम करते हैं।
सामाजिक एकता का संदेश
प्रदीप शर्मा और मोइनुद्दीन अंसारी जैसे लोग समाज को यह दिखाते हैं कि भले ही लोग अलग-अलग धर्मों और जातियों का पालन करते हों, लेकिन मानवीय परंपराओं और त्योहारों के प्रति सम्मान उन्हें आपस में जोड़ता है। जिस तरह हिंदू कारीगर प्रदीप शर्मा मुहर्रम के लिए ताजिया तैयार कर रहे हैं, उसी तरह कई मुस्लिम कारीगर भी दशहरा जैसे त्योहारों पर रावण के पुतले बनाने में अपनी विशेषज्ञता दिखाते हैं। गया जिले की यह परंपरा समाज में एकता, शांति और भाईचारे की मिसाल पेश करती है, जो समय के साथ और भी मजबूत हो रही है।
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