छपरा के किसान ने बदली तकदीर, जैविक विधि से मौसमी की खेती कर कमा रहे हैं मुनाफा

बिहार के छपरा जिले के एक प्रगतिशील किसान ने पारंपरिक खेती को छोड़कर जैविक तरीके से मौसमी के बाग लगाए हैं, जिससे उन्हें महज तीन साल में शानदार पैदावार मिल रही है।

खेती के नए तौर-तरीके और बिहार के किसान

बिहार के छपरा जिले में खेती का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। अब यहां के किसान केवल धान और गेहूं जैसी पारंपरिक फसलों तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि वे बागवानी की ओर रुख कर रहे हैं और फलों व फूलों की खेती के जरिए अपनी आर्थिक स्थिति को मजबूत कर रहे हैं। आधुनिक दौर में बागवानी की सबसे बड़ी खूबी यह है कि किसान अब एक ही जमीन पर एक साथ कई तरह की फसलें उगा रहे हैं। इसे सह-फसली तकनीक कहा जाता है, जिसमें मुख्य फल के साथ सब्जियां और फूल भी लगाए जाते हैं। इस तकनीक का सबसे बड़ा फायदा यह है कि जो भी खर्च बागवानी की तैयारी या मेहनत में आता है, वह इन छोटी फसलों से ही निकल जाता है। इसके चलते मुख्य फल की बिक्री से होने वाली पूरी कमाई सीधे किसान के मुनाफे में जुड़ जाती है।

नर्वदेश्वर गिरी की अनूठी पहल

इस नई कृषि क्रांति के केंद्र में छपरा जिले के खैरा प्रखंड के सैदूपुर मठिया गांव के रहने वाले नर्वदेश्वर गिरी का नाम प्रमुखता से लिया जा रहा है। वे न केवल अपने गांव बल्कि पूरे इलाके के अन्य किसानों के लिए एक प्रेरणा बन चुके हैं। उन्होंने पूरी तरह से जैविक और प्राकृतिक विधि अपनाते हुए एकीकृत कृषि का उदाहरण पेश किया है। उनकी मौसमी की बागवानी ने स्थानीय किसानों को यह दिखाया है कि यदि सही दिशा में प्रयास किए जाएं, तो खेती को मुनाफे का सौदा बनाया जा सकता है। नर्वदेश्वर गिरी की यह सफलता बताती है कि परंपरागत खेती से हटकर आधुनिक और वैज्ञानिक तरीकों को अपनाना भविष्य के लिए कितना फायदेमंद हो सकता है।

पारंपरिक खेती से आधुनिक बागवानी तक का सफर

किसी भी अन्य किसान की तरह, नर्वदेश्वर गिरी भी लंबे समय से पारंपरिक रूप से गेहूं और धान की ही खेती किया करते थे। लेकिन इस खेती में एक बड़ी चुनौती यह थी कि लागत बहुत ज्यादा आती थी और बदले में मुनाफा उतना नहीं मिल पाता था। कभी-कभी तो प्राकृतिक आपदाओं या बाजार के उतार-चढ़ाव के कारण उन्हें भारी नुकसान का सामना भी करना पड़ता था। इसी निरंतर हो रहे घाटे और आर्थिक तंगी से बाहर निकलने के लिए उन्होंने नई राह तलाशने का फैसला किया। उन्होंने कृषि के क्षेत्र में मार्गदर्शन पाने के लिए कृषि विज्ञान केंद्र, मांझी के वैज्ञानिकों से संपर्क साधा।

प्रशिक्षण और मौसमी का चुनाव

कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों ने नर्वदेश्वर गिरी के समर्पण को देखते हुए न केवल उन्हें तकनीकी सलाह दी, बल्कि समय-समय पर प्रशिक्षण लेने के लिए प्रोत्साहित भी किया। वैज्ञानिकों की सलाह पर ही वे छपरा से बाहर अन्य राज्यों में भी कृषि प्रशिक्षण लेने गए। इसी यात्रा के दौरान उन्हें मौसमी की बागवानी के बारे में विस्तार से जानने का मौका मिला। उन्होंने देखा कि किस तरह सही तकनीक और जैविक खाद के प्रयोग से मौसमी का उत्पादन बढ़ाया जा सकता है। प्रशिक्षण से लौटने के बाद उन्होंने खुद पर भरोसा जताया और एक उन्नत नर्सरी से संपर्क कर अच्छी गुणवत्ता के मौसमी के पौधे मंगवाए।

महज तीन साल में लदे फल

खेती के पारंपरिक तरीकों से हटकर उन्होंने अपने खेत में मौसमी के पौधे लगाए। जैविक विधि के प्रति उनका जुड़ाव इतना गहरा था कि उन्होंने रसायनों के बजाय पूरी तरह से प्राकृतिक खादों का उपयोग किया। उनकी कड़ी मेहनत और वैज्ञानिकों के दिशा-निर्देशों का सकारात्मक परिणाम यह निकला कि पौधा लगाने के महज दो से तीन साल के भीतर ही उनके बगीचे के पेड़ मौसमी के फलों से लद गए। आज उनका बगीचा उन किसानों के लिए एक जीता-जागता उदाहरण है, जो अपनी आय को दोगुना करने का सपना देखते हैं।

एकीकृत कृषि के लाभ

नर्वदेश्वर गिरी का मॉडल केवल एक फल तक सीमित नहीं है। वे जैविक कृषि को एक पैकेज के रूप में अपनाते हैं। एकीकृत कृषि अपनाने का मुख्य लाभ यह होता है कि मिट्टी की उर्वरता लंबे समय तक बनी रहती है। रसायनों का उपयोग न करने से पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं होता और उत्पादित फल स्वास्थ्य के लिए भी बेहतर होते हैं। छपरा के किसान अब यह समझने लगे हैं कि फल और फूलों की बागवानी करके वे न केवल अपनी जेब भर सकते हैं, बल्कि बाजार की बढ़ती मांग को भी पूरा कर सकते हैं। आज सैदूपुर मठिया गांव में उनकी इस पहल ने बागवानी के क्षेत्र में नई संभावनाएं खोल दी हैं।

किसानों के लिए प्रेरणा

नर्वदेश्वर गिरी की सफलता केवल उनकी व्यक्तिगत जीत नहीं है, बल्कि यह उन सभी किसानों के लिए एक संदेश है जो पारंपरिक खेती के चक्रव्यूह में फंसे हुए हैं। छपरा के कृषि परिदृश्य में यह बदलाव दर्शाता है कि कैसे थोड़े से मार्गदर्शन, सही प्रशिक्षण और नवाचार के साथ किसान अपनी मेहनत का सही मूल्य पा सकते हैं। नर्वदेश्वर गिरी का कहना है कि अगर सही तरीके से जैविक कृषि की जाए, तो लागत कम होती है और गुणवत्तापूर्ण फलों का उत्पादन होने से बाजार में उनकी मांग भी अधिक होती है। अब वे अपने गांव में अन्य लोगों को भी जैविक बागवानी की तकनीक सिखाने के लिए तत्पर रहते हैं।

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