उदयपुर: थर्माकोल या प्लास्टिक नहीं, अभ्रक से तैयार होता है रियासतकालीन परंपरा वाला खास ताजिया

राजस्थान के उदयपुर में मेवाफरोश समाज द्वारा तैयार किया जाने वाला अभ्रक का ताजिया मोहर्रम का मुख्य केंद्र है, जिसकी परंपरा रियासतकाल से चली आ रही है।

अभ्रक की कलाकारी का अद्भुत नमूना

राजस्थान के उदयपुर में मोहर्रम के मौके पर एक ऐसा ताजिया देखने को मिलता है जो अपनी बनावट के कारण बेहद खास है। यहाँ थर्माकोल या प्लास्टिक का इस्तेमाल करने के बजाय अभ्रक का उपयोग किया जाता है। उदयपुर का यह ताजिया पूरे राजस्थान में अपने आप में इकलौता है, जिसे बनाने में कारीगरों को सालभर का समय लग जाता है।

रियासतकाल से जुड़ी परंपरा

मेवाफरोश समाज द्वारा तैयार किया जाने वाला यह ताजिया रियासतकाल से चली आ रही परंपरा का हिस्सा है। कुरैशी महासभा के अध्यक्ष रेहान कुरैशी के अनुसार, मेवाड़ में ताजियादारी की यह अनूठी प्रथा बहुत पुरानी है। इसका जिक्र मेवाड़ के मशहूर ऐतिहासिक ग्रंथ वीर विनोद में भी दर्ज है। इतिहास के पन्नों में उल्लेख मिलता है कि उस दौरान महाराणा की सेना में मुस्लिम सिपाहियों की एक अलग पलटन तैनात थी।

पलटन मस्जिद से जुड़ा है इतिहास

इस ऐतिहासिक पलटन के नाम पर ही उदयपुर के चेतक सर्किल इलाके में स्थित पलटन मस्जिद का नामकरण हुआ। इसी स्थान पर वर्षों से यह बड़ा ताजिया बनाया जाता रहा है। सालभर चलने वाले इस काम में नक्काशी और मरम्मत का बारीक कार्य शामिल होता है, जिसके चलते यह ताजिया मोहर्रम के दौरान हर किसी के लिए मुख्य आकर्षण का केंद्र बन जाता है।

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