कश्मीर नहीं, अब बिहार की तपती धरती पर भी लहलहा रहे सेब
सेब का नाम सुनते ही सबसे पहले जेहन में कश्मीर की वादियों का ख्याल आता है। अमूमन यह माना जाता रहा है कि सेब केवल ठंडे इलाकों की फसल है, लेकिन बिहार के पश्चिम चंपारण के किसानों ने इस धारणा को गलत साबित कर दिया है। जिले के कई किसानों ने ऐसी तकनीक और किस्म का चुनाव किया है, जिससे 43 डिग्री सेल्सियस जैसी चिलचिलाती गर्मी में भी रसीले सेब पैदा हो रहे हैं। यह सफलता न केवल इन किसानों के लिए बल्कि पूरे राज्य के कृषि क्षेत्र के लिए एक मिसाल बन गई है।
गमले से शुरू हुआ सफर
इस अनूठी पहल में सबसे चर्चित नाम मझौलिया प्रखंड के बनकट मुसहरी गांव के रहने वाले रविकांत पांडे का है। रविकांत पिछले 3 वर्षों से सेब की बागवानी में जुटे हैं। वे राज्य के उन चुनिंदा किसानों में शामिल हैं जिन्होंने सबसे पहले बिहार में सेब की सफल पैदावार करके दिखाई। हैरानी की बात यह है कि उन्होंने सेब के पेड़ को सिर्फ जमीन पर ही नहीं, बल्कि अपने घर की छत पर गमलों में भी उगाकर इसकी उत्पादकता साबित की है। उनकी मेहनत से प्रेरित होकर अब इलाके के अन्य लोग भी बागवानी की ओर रुख कर रहे हैं।
व्यावसायिक खेती की ओर बढ़ते कदम
केवल छोटे स्तर पर ही नहीं, बल्कि अब किसान इसे बड़े पैमाने पर करने की तैयारी कर रहे हैं। नौतन प्रखंड के बैकुंठवा गांव के रहने वाले शिशिर दूबे ने सेब की खेती में बड़ी सफलता हासिल की है। उन्होंने करीब 3 एकड़ के बगीचे में सेब के सैकड़ों पौधे लगाए हैं, जिनमें इस बार जबरदस्त फल लगे हैं। शिशिर दूबे का लक्ष्य अब बहुत स्पष्ट है। उनका कहना है कि वे बिहार में सेब की खेती को एक कमर्शियल यानी व्यावसायिक रूप देना चाहते हैं। वे न केवल इसे बाजार में बेचना चाहते हैं, बल्कि भविष्य में खुद को सेब के एक निर्यातक के रूप में स्थापित करने का सपना भी देख रहे हैं।
मेराजुल हक की पहल
बेतिया जिला मुख्यालय के रहने वाले मेराजुल हक भी इस आधुनिक कृषि क्रांति का हिस्सा बन गए हैं। उन्होंने 3 साल पहले अपने खेतों में सेब के पौधे लगाए थे। उनकी निरंतर देखभाल का नतीजा यह है कि इस बार उनके बगीचे में सेब की बंपर पैदावार हुई है। जब उन्होंने अपने पेड़ों पर हरे और लाल रंग के बड़े और मीठे सेब देखे, तो उनका उत्साह और बढ़ गया। मेराजुल ने भी अब ठान लिया है कि वे इसे व्यावसायिक स्तर पर ले जाएंगे ताकि अन्य किसानों को भी रोजगार और लाभ मिल सके।
गर्मी सहने वाली विशेष किस्म
इन किसानों की कामयाबी के पीछे एक बड़ा कारण सही किस्म का चुनाव है। जानकारों के अनुसार, गर्म जलवायु वाले प्रदेशों में सफल बागवानी के लिए HRMN 99 किस्म का इस्तेमाल अनिवार्य है। इस किस्म को उद्यान वैज्ञानिकों ने विशेष रूप से गर्म इलाकों के लिए विकसित किया है। यह किस्म 45 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान को आसानी से झेल सकती है और बेहतर फल भी देती है। पश्चिम चंपारण के ये प्रगतिशील किसान इसी तकनीक को अपनाकर देश के अन्य गर्म इलाकों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन रहे हैं।
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