बालाघाट में किसानों पर जमीन खाली करने का संकट, वन विभाग के नोटिस से मोहगांव माल में हड़कंप

मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले में मोहगांव माल गांव के दर्जनों किसानों को वन विभाग ने जमीन खाली करने के नोटिस थमाए हैं, जिससे ग्रामीणों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है। किसान 50 वर्षों से खेती करने का दावा कर रहे हैं, जबकि विभाग ने साक्ष्य न मिलने पर 60 दिनों का अल्टीमेटम दिया है।

बालाघाट के किसानों के सिर पर मंडराया बेदखली का खतरा

मध्य प्रदेश का बालाघाट जिला एक आदिवासी बहुल क्षेत्र है, जहां की बड़ी आबादी वनों के किनारे बसे गांवों में निवास करती है। इन क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए जंगल की जमीन ही आजीविका का एकमात्र साधन है। यहां के ग्रामीण पिछले कई दशकों से खेती-किसानी कर अपना जीवन यापन कर रहे हैं, लेकिन अब परसवाड़ा विकासखंड के ग्राम मोहगांव माल से एक ऐसी खबर सामने आई है जिसने पूरे क्षेत्र में हड़कंप मचा दिया है। वन विभाग ने यहां के करीब एक दर्जन किसानों को अपनी जमीन खाली करने के लिए आधिकारिक नोटिस जारी कर दिया है, जिससे इन परिवारों के सामने बेघर होने और रोजी-रोटी छिन जाने का बड़ा खतरा उत्पन्न हो गया है।

क्या है मोहगांव माल का पूरा मामला

मोहगांव माल गांव घने जंगलों से घिरा हुआ है। दशकों पहले यहां कुछ लोग आकर बसे थे, जिनमें मुख्य रूप से अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के सदस्य शामिल थे। अपनी आजीविका चलाने के लिए इन लोगों ने जंगल से लगी भूमि को खेती योग्य बनाया और धीरे-धीरे वहां बस गए। स्थानीय निवासियों का स्पष्ट दावा है कि वे यहां पिछले 50 साल से भी अधिक समय से खेती करते आ रहे हैं। इस भूमि पर उनकी पीढ़ियों का पसीना बहा है। हालांकि, अब वन विभाग द्वारा दी गई बेदखली की चेतावनी ने इन किसानों के जीवन में एक बड़ा तनाव पैदा कर दिया है।

वन विभाग का दावा और किसानों की स्थिति

एक तरफ जहां जिला प्रशासन बीते एक साल से व्यक्तिगत और सामुदायिक वनाधिकार पट्टे वितरित करने की दिशा में कार्य कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ वन विभाग की ओर से शासकीय भूमि को खाली कराने के लिए दिए जा रहे नोटिस ने विरोधाभासी स्थिति पैदा कर दी है। विभाग का तर्क है कि किसानों के पास 13 दिसंबर 2005 से पहले के निवासरत होने या कब्जे के पर्याप्त सबूत मौजूद नहीं हैं। इसी आधार पर वन विभाग ने उनके दावों को खारिज करते हुए उन्हें 60 दिनों का अल्टीमेटम दिया है। विभाग के अनुसार, यदि किसान इस अवधि के भीतर जिला स्तरीय वन अधिकार समिति के समक्ष अपने दावे और साक्ष्य पेश नहीं कर पाते हैं, तो नियमानुसार बेदखली की कार्रवाई की जाएगी।

पलायन का डर और रोजी-रोटी का संकट

प्रभावित किसानों का कहना है कि उनकी पूरी दुनिया इसी खेती पर टिकी है। यदि उनके खेत छीन लिए गए, तो उनके सामने भीषण बेरोजगारी की स्थिति पैदा हो जाएगी। ग्रामीणों का मानना है कि कृषि भूमि छिन जाने से परिवार चलाना नामुमकिन हो जाएगा और उन्हें मजबूरी में मजदूरी करने के लिए महानगरों की ओर पलायन करना पड़ेगा। इन किसानों की एकमात्र मांग यह है कि सरकार उनकी स्थिति को देखते हुए उन्हें वन अधिकार पट्टे प्रदान करे ताकि उनकी रोजी-रोटी सुरक्षित रह सके।

वन विभाग पर लगे गंभीर आरोप

ग्रामीणों ने विभाग पर कई गंभीर आरोप भी लगाए हैं। किसानों का आरोप है कि जमीन खाली कराने के लिए उन पर तरह-तरह का दबाव बनाया जा रहा है। स्थानीय लोगों के अनुसार, वन विभाग की ओर से ट्रैक्टर मालिकों को स्पष्ट निर्देश दे दिए गए हैं कि वे कब्जाधारी किसानों के खेतों में ट्रैक्टर न चलाएं। ग्रामीणों का दावा है कि यदि कोई ट्रैक्टर चालक खेती के लिए वहां जाता है, तो उससे कथित तौर पर 2,000 रुपये की रिश्वत भी मांगी जा रही है।

डीएफओ ने दी चेतावनी

इस पूरे घटनाक्रम पर उत्तर सामान्य वन मंडल के डीएफओ रेशम सिंह धुर्वे ने अपनी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि किसानों को यह साबित करना अनिवार्य होगा कि वे 2005 से पहले से उक्त भूमि पर खेती कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि यदि किसान अपना पक्ष रखने या सबूत पेश करने में विफल रहते हैं, तो विभाग की ओर से नियमानुसार अगली कानूनी कार्रवाई की जाएगी। अब देखना यह होगा कि क्या ये किसान अपने पुराने दावों को सिद्ध करने के लिए आवश्यक प्रमाण जुटा पाएंगे या फिर उन्हें अपनी पुश्तैनी जमीन से हाथ धोना पड़ेगा।

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