उदयपुर: मोहर्रम पर 132 साल पुरानी छड़ी मिलन परंपरा, सांप्रदायिक एकता की अनूठी मिसाल

उदयपुर की भड़भूजा घाटी में मोहर्रम के मौके पर सदियों पुरानी 'छड़ी मिलन' की परंपरा निभाई गई, जो हिंदू-मुस्लिम एकता और आपसी भाईचारे का प्रतीक बनी हुई है।

सांप्रदायिक सौहार्द का अनोखा संगम

राजस्थान के उदयपुर में मोहर्रम का त्योहार केवल गम का ही नहीं बल्कि आपसी भाईचारे और एकता का भी संदेश लेकर आता है। उदयपुर की भड़भूजा घाटी में मोहर्रम की नौवीं तारीख को एक खास रस्म निभाई जाती है, जिसे छड़ी मिलन के नाम से जाना जाता है। यह परंपरा करीब 132 साल से चली आ रही है और आज भी पूरी श्रद्धा के साथ इसका पालन किया जाता है।

कैसे हुई थी इस परंपरा की शुरुआत

कुरैशी महासभा के अध्यक्ष रेहान कुरैशी के मुताबिक, इस रस्म की शुरुआत के पीछे एक खास मकसद था। उस दौर में जब उदयपुर में महाराणा भूपाल सिंह का शासन था, तब मेवाफरोश और नायक समाज के बीच किसी बात को लेकर विवाद हो गया था। इस तनावपूर्ण स्थिति को खत्म करने और दोनों समुदायों के बीच सुलह कराने के लिए हाजी अब्दुल बाकी ने एक पहल की थी। उन्होंने ही सबसे पहले इस छड़ी मिलन की शुरुआत की, ताकि आपसी मतभेद मिटकर शांति कायम हो सके।

पीढ़ियों से जारी है यह सफर

आज 132 साल बीत जाने के बाद भी यह परंपरा उतनी ही जीवंत है। हाजी अब्दुल बाकी की पांचवीं पीढ़ी के लोग आज भी इस रस्म को जिम्मेदारी के साथ निभा रहे हैं। मोहर्रम के दौरान निकाली जाने वाली इन छड़ियों को कर्बला का प्रतीक माना जाता है। जब ये छड़ियां एक-दूसरे से मिलती हैं, तो यह न केवल धार्मिक आस्था का प्रदर्शन होता है, बल्कि उदयपुर की मशहूर गंगा-जमुनी तहजीब की भी एक झलक पेश करता है।

एकता की मिसाल

यह रस्म शहर में एकता का वह उदाहरण है जो बीते सवा सौ साल से अधिक समय से कायम है। आज के दौर में भी इस परंपरा को निभाने वाले लोग इसे अपनी जिम्मेदारी मानते हैं ताकि उदयपुर का सामाजिक ताना-बाना और भी मजबूत बना रहे। छड़ी मिलन के समय उमड़ने वाली भीड़ और लोगों का उत्साह यह बताने के लिए काफी है कि पुरानी परंपराएं आज भी समाज को एकजुट रखने में बड़ी भूमिका निभा रही हैं।

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