बीजोपचार से सुरक्षित होगी फसल
भारत और बिहार में धान की खेती का बड़ा महत्व है। जून-जुलाई के दौरान किसान धान की नर्सरी तैयार करने में व्यस्त रहते हैं। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि फसल की मजबूती नर्सरी की गुणवत्ता पर निर्भर करती है। यदि शुरुआत में ही बीज या मिट्टी से रोग लग जाए, तो आगे चलकर पैदावार पर बुरा असर पड़ता है। प्रोफेसर (डॉ.) एसके सिंह का कहना है कि बीजोपचार करने से बीज के चारों ओर एक सुरक्षा कवच बन जाता है, जो शुरुआती 25-30 दिनों तक रोगों से सुरक्षा करता है।
फसल को नुकसान पहुँचाने वाले रोग
नर्सरी के दौरान धान में बकानी, ब्लास्ट, ब्राउन स्पॉट, शीथ ब्लाइट और सीडलिंग रॉट जैसी बीमारियां फफूंद के कारण तेजी से फैलती हैं। बीजोपचार न केवल अंकुरण को तेज और समान बनाता है, बल्कि पौधों को शुरुआती दौर की बीमारियों से भी बचाता है।
वैज्ञानिक तरीके से बीजोपचार के 4 चरण
- बीज छंटाई: बीज को 2% नमक के घोल में डालें। जो बीज तैरने लगें, उन्हें बाहर निकाल दें और भारी बीजों को 2-3 बार साफ पानी से धोकर छाया में सुखाएं।
- रासायनिक उपचार: कार्बेन्डाजिम 1.5-2 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज या फिर कैप्टान या थीरम 3 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज के हिसाब से उपचार करें।
- जैविक उपचार: रसायनों के बाद ट्राइकोडर्मा विरिडे 10 ग्राम और स्यूडोमोनास फ्लोरेसेंस 10 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज के साथ मिलाएँ। यह जड़ों के विकास में मदद करता है।
- जैव उर्वरक: पीएसबी और एजेटोबैक्टर का 6-6 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज के हिसाब से उपयोग करें ताकि पौधों को पोषक तत्व मिल सकें।
सावधानी बरतना है जरूरी
बीजोपचार करते समय दवाओं का सही क्रम रखना अनिवार्य है। पहले फफूंदनाशक, फिर कीटनाशक, जैविक एजेंट और अंत में जैव उर्वरक का उपयोग करें। ध्यान रहे कि उपचारित बीजों को कभी भी धूप में न सुखाएं और बुवाई तुरंत करें। सुरक्षा के लिए दस्ताने और मास्क का प्रयोग करें। साथ ही, इन बीजों का सेवन न करें और न ही इन्हें पशुओं को खिलाएं। बदलती जलवायु के दौर में बीजोपचार कोई विकल्प नहीं, बल्कि एक अनिवार्यता बन चुका है, जिससे किसान समृद्ध फसल प्राप्त कर सकते हैं।
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