मोहर्रम: झांसी की अनूठी परंपरा है राई का ताजिया, जानें राजा गंगाधर राव से इसका क्या है संबंध

उत्तर प्रदेश के झांसी में मोहर्रम के दौरान निकाला जाने वाला राई का ताजिया करीब 200 साल पुरानी हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल है, जिसे राजा गंगाधर राव ने शुरू किया था।

साझा संस्कृति का प्रतीक है राई का ताजिया

झांसी में मोहर्रम के अवसर पर निकलने वाला राई का ताजिया न केवल एक धार्मिक अनुष्ठान है, बल्कि यह शहर की गंगा-जमुनी तहजीब की एक जीवंत पहचान भी है। यह परंपरा 200 साल से भी अधिक पुरानी मानी जाती है और आज भी पूरे उत्साह के साथ मनाई जाती है।

राजा गंगाधर राव और एकता का संदेश

ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार, राई के ताजिये की शुरुआत झांसी के शासक राजा गंगाधर राव ने की थी। उस दौर में झांसी में हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदाय के लोग बड़ी संख्या में निवास करते थे। राजा गंगाधर राव की मंशा थी कि समाज के सभी वर्गों के बीच आपसी सम्मान और भाईचारा बना रहे। उन्होंने इस परंपरा को बढ़ावा देकर समाज को एक सूत्र में पिरोने का काम किया, ताकि लोग एक दूसरे के त्योहारों और आस्था के प्रति संवेदनशील बनें।

क्यों खास है यह ताजिया

राई का ताजिया सामान्य ताजियों से काफी अलग और विशेष होता है। इसे बनाने की प्रक्रिया में विशेष प्रकार की राई और अन्य पारंपरिक सामग्रियों का इस्तेमाल किया जाता है। मोहर्रम के दिनों में इसे बेहद श्रद्धा के साथ सजाया जाता है। इस दौरान निकलने वाले जुलूस की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें केवल एक समुदाय नहीं, बल्कि विभिन्न धर्मों के लोग बढ़-चढ़कर भागीदारी निभाते हैं। यह आयोजन मात्र एक धार्मिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि सामाजिक सौहार्द का एक उत्सव बन चुका है जिसे स्थानीय लोग पीढ़ियों से संजोए हुए हैं।

सदियों से कायम है भाईचारे की विरासत

समय के साथ शासन और प्रशासन में कई बड़े बदलाव आए, लेकिन झांसी में शुरू की गई भाईचारे की यह अनूठी मिसाल आज भी पूरी तरह से कायम है। आज के आधुनिक दौर में भी राई का ताजिया यह संदेश देता है कि आपसी सम्मान और सद्भाव ही किसी भी समाज की सबसे बड़ी ताकत होती है। झांसी शहर आज भी अपनी इस सांस्कृतिक विरासत को पूरे गर्व के साथ आगे बढ़ा रहा है, जिसे देखने के लिए मोहर्रम के दौरान हजारों लोग उमड़ते हैं।

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