मानसून की अनिश्चितता और खेती पर असर
छत्तीसगढ़ में इस साल मानसून की गति धीमी होने के कारण बिलासपुर समेत कई इलाकों के किसान असमंजस में हैं। पर्याप्त बारिश न होने की वजह से खरीफ फसलों, विशेषकर धान की बुवाई में देरी हो रही है। खेती के पूरे कैलेंडर पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं, जिससे किसानों की चिंता बढ़ना स्वाभाविक है।
कम अवधि वाली धान की किस्मों का चुनाव
बिलासपुर के जैविक किसान जदूनंदन प्रसाद वर्मा ने किसानों को सलाह दी है कि वे घबराने के बजाय वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाएं। उनका कहना है कि लंबे समय में पकने वाली धान की किस्मों के स्थान पर कम अवधि में तैयार होने वाली धान की किस्मों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। इससे मौसम की अनिश्चितता के कारण फसल खराब होने का जोखिम काफी हद तक कम हो जाता है और समय पर पैदावार मिलने की संभावना भी बढ़ जाती है।
धान के साथ दलहन और तिलहन का विकल्प
जदूनंदन प्रसाद वर्मा ने धान की खेती के साथ-साथ दलहन और तिलहन फसलों को भी खेत में जगह देने का सुझाव दिया है। इस पद्धति के कई लाभ हैं:
- लोबिया, उड़द और तिल जैसी फसलों को लगाने से अगर बारिश कम भी होती है, तो किसानों को आर्थिक नुकसान नहीं होगा और ये फसलें आय का जरिया बनेंगी।
- यदि मानसून अच्छा रहता है और बारिश भरपूर होती है, तो इन दलहन-तिलहन फसलों को खेत में ही जोतकर हरी खाद के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।
- यह प्रक्रिया मिट्टी में जैविक कार्बन की मात्रा बढ़ाती है, जिससे मिट्टी की गुणवत्ता और भविष्य में उत्पादन क्षमता में सुधार होता है।
मिट्टी की उर्वरता और लागत में कमी
विशेषज्ञों के अनुसार, दलहन वाली फसलें वातावरण से नाइट्रोजन लेकर मिट्टी में जमा करने का काम करती हैं। इससे रासायनिक खाद पर निर्भरता कम होती है और खेती की लागत में बचत होती है। यह अंतरवर्ती खेती किसानों के लिए एक टिकाऊ और सुरक्षित विकल्प है, जो बदलते मौसम के बीच भी दोहरा फायदा सुनिश्चित करती है।
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