मुलाकात के बाद गहराया उइगरों का संकट
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच हुई हालिया द्विपक्षीय वार्ता के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई सवाल खड़े हो गए हैं। वॉशिंगटन और बीजिंग की ओर से जारी आधिकारिक बयानों में मानवाधिकारों, विशेष रूप से शिनजियांग में उइगर समुदाय के उत्पीड़न का कोई जिक्र नहीं किया गया। यह स्थिति तब बनी है जब डोनाल्ड ट्रंप ने शी जिनपिंग को अपना दोस्त और अच्छा इंसान बताया है।
रुशान अब्बास की भावुक अपील
उइगर कार्यकर्ता रुशान अब्बास ने अमेरिकी प्रशासन से अपनी बहन गुलशन अब्बास की रिहाई की उम्मीद लगाई थी, जिन्हें चीन में लगभग आठ साल से हिरासत में रखा गया है। 14 मई को अमेरिकी अखबार द हिल में लिखे अपने लेख में उन्होंने कहा था कि दुनिया के सबसे ताकतवर लोकतांत्रिक देश के नेता को एक तानाशाह की आंखों में आंखें डालकर उनकी बहन की रिहाई की मांग करनी चाहिए। उल्लेखनीय है कि ट्रंप की बीजिंग यात्रा से पहले अमेरिकी सीनेट और हाउस ऑफ रिप्रजेंटेटिव्स ने छह लोगों की रिहाई के लिए प्रस्ताव भी पारित किए थे, जिनमें गुलशन अब्बास का नाम शामिल था।
क्यों बढ़ रही है निराशा?
द डिप्लोमैट की रिपोर्ट के अनुसार, इस बैठक में मानवाधिकारों का मुद्दा न उठाए जाने से उइगर समुदाय का अमेरिका पर भरोसा कम हुआ है। समुदाय के लोग अब परिवार और दोस्तों की मदद के लिए अन्य विकल्प तलाश रहे हैं। 33 वर्षीय एक्टिविस्ट सालिह हुदयार ने कहा कि नरसंहार के बीच इस तरह की मुलाकात समुदाय के लिए एक बड़ा नुकसान है। उनके अनुसार, बातचीत से पहले उइगरों पर हो रहे अत्याचार को बंद करने की शर्त रखी जानी चाहिए थी।
क्या है उइगरों का मुद्दा?
चीनी सरकार पर 2017 से लगातार मानवाधिकार हनन के आरोप लग रहे हैं। आंकड़ों के अनुसार, चीन ने लगभग 10 लाख से ज्यादा तुर्किक जातीय समूहों को हिरासत में लिया है। इनमें से अधिकांश शिनजियांग प्रांत के उइगर मुस्लिम हैं, जो वहां लंबे समय से निगरानी और उत्पीड़न का सामना कर रहे हैं।
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