परंपरा और हुनर की विरासत
मुहर्रम का महीना संयम, त्याग और शहादत को याद करने का समय होता है। इस दौरान हजरत इमाम हुसैन की याद में ताजिया निकालने की परंपरा सदियों पुरानी है। बिहार के गया जिले के आमस प्रखंड स्थित बैदा गांव में रहने वाले मोहम्मद मोइनुद्दीन अंसारी का परिवार इस कला को पूरी निष्ठा के साथ निभा रहा है। मोइनुद्दीन अंसारी की चौथी पीढ़ी आज ताजिया बनाने के काम में जुटी हुई है। यह हुनर उन्हें अपने दादा सुखाडी मियां और पिता रसूल अंसारी से विरासत में मिला है।
40 रुपये से शुरू हुआ था सफर
समय के साथ ताजिया बनाने की लागत और उसकी बनावट में बड़ा बदलाव आया है। मोहम्मद मोइनुद्दीन के अनुसार, लगभग 40 वर्ष पूर्व वे मात्र 40 रुपये में ताजिया तैयार कर दिया करते थे। हालांकि, आज के दौर में ताजिया बनाने की तकनीक और सामग्री दोनों बदल गई हैं। अब एक ताजिया बनाने में लगभग 20 हजार रुपये का खर्च आता है और इसके लिए कारीगरों को 5 से 7 हजार रुपये तक की मजदूरी मिलती है। एक ताजिया को अंतिम रूप देने में करीब 6 से 7 दिन का समय लग जाता है।
सामग्री और कारीगरी
ताजिया को आकर्षक और मजबूत बनाने के लिए इसमें कई तरह की चीजों का इस्तेमाल किया जाता है। इसमें लोहे का फ्रेम, बांस, रंगीन कपड़े और विशेष रूप से इलेक्ट्रिक लाइटों का प्रयोग होता है, जिससे ताजिया रात में दूधिया रोशनी से जगमगा उठते हैं। मोहम्मद मोइनुद्दीन पेशे से एक दर्जी हैं, लेकिन उनकी बनाई गई ताजिया की फिनिशिंग इतनी शानदार होती है कि शेरघाटी अनुमंडल और आसपास के बड़े अखाड़ों के लोग विशेष रूप से उनसे ही ताजिया बनवाना पसंद करते हैं।
बदलते हालात और सीमित काम
एक समय था जब मोइनुद्दीन का परिवार 15 से 20 दिनों के भीतर 50 से अधिक छोटी-बड़ी ताजिया बना लिया करता था। वे गया जिले से बाहर जाकर भी अपना हुनर दिखाते थे। हालांकि, अब उम्र और बिगड़ते स्वास्थ्य के कारण उन्होंने काम का दायरा थोड़ा सीमित कर लिया है। इस वर्ष उन्हें हमजापुर, शेरघाटी मियां बाड़ा, वारिस नगर, लगन तकिया और नई बाजार शेरघाटी जैसे स्थानों से चार से पांच ऑर्डर मिले हैं। आज भी शेरघाटी के प्रमुख अखाड़ों में मोइनुद्दीन के हाथों से बनी ताजिया की धूम रहती है।
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