संघर्ष से सफलता का सफर
नागौर जिले के डेगाना क्षेत्र के बाजोली गांव में रहने वाले 36 वर्षीय गोपाल डूडी की कहानी उन लोगों के लिए एक मिसाल है जो विपरीत परिस्थितियों में भी हार नहीं मानते। पांच वर्ष की आयु में पिता का साया उठ जाने के बाद गोपाल का जीवन संघर्षों से भर गया। आर्थिक तंगी के चलते वे केवल आठवीं कक्षा तक ही पढ़ पाए और 13 साल की उम्र में ही परिवार का पेट पालने के लिए काम की तलाश शुरू कर दी। अगले 17 वर्षों तक उन्होंने महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और गुजरात में कपड़ा मिलों में मशीनरी सुधारने का काम किया।
कोरोना और खेती में वापसी
कोरोना महामारी के दौरान गोपाल की नौकरी छूट गई, जिसके बाद वे अपने गांव वापस लौट आए। उनके पास 15 बीघा पुश्तैनी जमीन थी, साथ ही नौकरी के दौरान की गई बचत से उन्होंने 32 बीघा और जमीन खरीदी। कुल 47 बीघा जमीन पर उन्होंने खेती की शुरुआत की और सिंचाई व्यवस्था के लिए करीब 30 लाख रुपये का निवेश किया। शुरुआत में पारंपरिक फसलों से उन्हें विशेष लाभ नहीं मिला, जिसके बाद उन्होंने कुछ नया करने का निश्चय किया।
चिया सीड्स की खेती और तकनीक
मध्य प्रदेश में काम करने के दौरान उन्होंने किसानों को चिया सीड्स उगाते देखा था, जिससे उन्हें प्रेरणा मिली। वर्ष 2023 में उन्होंने दो बीघा जमीन पर प्रयोग किया, लेकिन खराब बीजों की वजह से फसल बर्बाद हो गई। हार न मानते हुए उन्होंने बीकानेर के कृषि अधिकारियों से संपर्क किया और उन्नत बीजों की जानकारी हासिल की। इसके अलावा, उन्होंने मध्य प्रदेश के मंदसौर जाकर खेती की बारीकियां सीखीं। वर्ष 2025 में उन्होंने 60 बीघा भूमि पर चिया की खेती की, जिसमें खुद की जमीन के अलावा लीज पर ली गई जमीन भी शामिल थी।
लाखों की बंपर कमाई
गोपाल बताते हैं कि उन्हें प्रति बीघा करीब चार क्विंटल उत्पादन मिल रहा है। इस तरह 60 बीघा से कुल 240 क्विंटल चिया सीड्स का उत्पादन हुआ है। बाजार भाव 20 से 25 हजार रुपये प्रति क्विंटल होने के कारण वे सालाना 30 से 40 लाख रुपये तक का मुनाफा कमा रहे हैं। यदि बीजों को 1,000 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से बेचा जाए, तो यह आय और भी अधिक बढ़ सकती है।
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