राजनीति के केंद्र में ब्राह्मण समाज
देश भर में ब्राह्मण समुदाय की राजनीतिक सक्रियता को लेकर तमाम चर्चाएं हो रही हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश के चुनावी गलियारों में यह समाज फिर से केंद्र बिंदु बनकर उभरा है। भारतीय जनता पार्टी के साथ ही समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने भी इस समुदाय को साधने के लिए अपनी रणनीति तेज कर दी है।
क्यों अहम है यह वोट बैंक
उत्तर प्रदेश की कुल आबादी में ब्राह्मण, त्यागी और भूमिहारों को जोड़कर देखा जाए तो इनका आंकड़ा करीब 14 फीसदी तक पहुंचता है। इस समुदाय की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इनका प्रभाव किसी एक जिले या क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि ये पूरे राज्य में फैले हुए हैं। राज्य के हर कोने में मौजूद होने के कारण ये किसी भी दल की जीत और हार का गणित बदलने की क्षमता रखते हैं।
सपा, बसपा और बीजेपी में खींचतान
साल 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले प्रमुख दलों के बीच ब्राह्मण मतदाताओं को अपने पाले में करने की होड़ मची है। इसके पीछे के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं:
- सीधे प्रभाव की क्षमता: राज्य भर में बिखरे होने के कारण इनका प्रभाव लगभग सभी विधानसभा क्षेत्रों में है।
- वोट ट्रांसफर की ताकत: चुनाव के समय यह वर्ग निर्णायक भूमिका निभाता है, जिससे राजनीतिक दलों को उम्मीद रहती है कि इनका समर्थन मिलने से जीत का मार्ग आसान होगा।
- गठबंधन की राजनीति: समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी द्वारा लगातार ब्राह्मण हितों की बात करने के पीछे इस समुदाय का बड़ा वोट आधार है, जिसे अनदेखा करना किसी भी पार्टी के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है।
फिलहाल, देखना यह होगा कि 2027 के चुनावी रण में ब्राह्मण मतदाताओं को अपने पाले में करने की यह कोशिश किस दल को सत्ता के करीब ले जाती है।
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