पाकिस्तान की कूटनीतिक सक्रियता के पीछे की वजह
मध्य पूर्व में जारी तनाव के बीच अमेरिका और ईरान को करीब लाने के लिए पाकिस्तान ने एक प्रमुख मध्यस्थ की भूमिका निभाई है। इस्लामाबाद ने न केवल दोनों देशों के बीच संदेश पहुंचाने का काम किया है, बल्कि बातचीत के लिए मंच उपलब्ध कराने और समझौते का माहौल बनाने में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इस पहल का महत्व इतना अधिक है कि अमेरिका और ईरान के बीच हुए अंतरिम समझौते को इस्लामाबाद मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग के नाम से जाना जा रहा है। इस पूरी प्रक्रिया में पाकिस्तान को एक मध्यस्थ और गवाह के रूप में दर्ज किया गया है।
अंतरराष्ट्रीय साख और क्षेत्रीय शक्ति बनने की चाह
लंबे समय से आर्थिक संकट और राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रहे पाकिस्तान के लिए यह एक मौका है अपनी वैश्विक छवि सुधारने का। विश्लेषकों का मानना है कि इस्लामाबाद खुद को केवल दक्षिण एशिया तक सीमित नहीं रखना चाहता, बल्कि वह एक जिम्मेदार क्षेत्रीय शक्ति के रूप में अपनी पहचान बनाना चाहता है। अमेरिका, ईरान, चीन और खाड़ी देशों के बीच संतुलन बनाकर वह अपनी अंतरराष्ट्रीय साख को मजबूत करने की कोशिश में है।
पाकिस्तान के लिए रणनीतिक और आर्थिक लाभ
- सीमा सुरक्षा: पाकिस्तान और ईरान के बीच लगभग 900 किलोमीटर लंबी सीमा है। ईरान में अस्थिरता का सीधा असर पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत पर पड़ता है, इसलिए वहां शांति बनाए रखना पाकिस्तान की मजबूरी और जरूरत दोनों है।
- ऊर्जा सुरक्षा: ऊर्जा आयात पर निर्भर पाकिस्तान के लिए तेल की कीमतों में उछाल घातक साबित हो सकता है। होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव कम होने से ऊर्जा आपूर्ति सुरक्षित रहती है।
- वॉशिंगटन से संबंधों में सुधार: अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना की वापसी के बाद पाकिस्तान का महत्व कम हो गया था। इस मध्यस्थता के जरिए वह अमेरिका के साथ अपने संबंधों को नई ऊंचाइयां देना चाहता है।
- आर्थिक मदद की उम्मीद: कूटनीतिक सफलता से IMF और पश्चिमी देशों के वित्तीय बाजारों तक पाकिस्तान की पहुंच आसान हो सकती है, जिससे उसे आर्थिक बेलआउट पैकेज पाने में मदद मिल सकती है।
- घरेलू राजनीति: प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और फील्ड मार्शल आसिम मुनीर इस उपलब्धि को अपनी कूटनीतिक जीत के रूप में पेश कर रहे हैं, जिससे उन्हें घरेलू मोर्चे पर मजबूती मिल रही है।
क्या मध्यस्थता की राह आसान है?
हालांकि पाकिस्तान की भूमिका की ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, फ्रांस और नॉर्वे जैसे देशों ने प्रशंसा की है, लेकिन अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम जैसे नेताओं ने पाकिस्तान की निष्पक्षता पर सवाल भी उठाए हैं। अगर यह समझौता सफल रहता है, तो पाकिस्तान मिडिल ईस्ट और साउथ एशिया के बीच एक मजबूत कूटनीतिक पुल बन सकता है। वहीं, अगर यह प्रयास विफल होता है या क्षेत्र में तनाव फिर से बढ़ता है, तो पाकिस्तान की यह संतुलनकारी रणनीति उसके लिए बड़ी चुनौती भी बन सकती है।
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