निर्जला एकादशी का महत्व
सनातन धर्म में निर्जला एकादशी को सभी एकादशियों में सबसे कठिन और फलदायी माना गया है। इस दिन श्रद्धालु न केवल अन्न बल्कि जल का भी त्याग करते हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार इसे पांडव एकादशी या भीमसेनी एकादशी भी कहा जाता है। मान्यता है कि महाभारत काल में भीमसेन के लिए महर्षि वेदव्यास ने इस व्रत का सुझाव दिया था। यह व्रत पूरे साल की अन्य सभी एकादशियों का पुण्य प्रदान करने वाला माना जाता है।
व्रत की तिथि और शुभ मुहूर्त
वैदिक पंचांग के अनुसार, ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि का प्रारंभ 24 जून को रात 8 बजकर 09 मिनट पर होगा, जो 25 जून को रात 8 बजकर 28 मिनट तक प्रभावी रहेगी। उदया तिथि की मान्यता के कारण व्रत 25 जून 2026 को रखा जाएगा।
पूजा की चरणबद्ध विधि
इस व्रत के लिए तैयारी एक दिन पूर्व से ही शुरू कर देनी चाहिए, जिसमें पूजा स्थल की स्वच्छता और तुलसी दल की व्यवस्था मुख्य है। पूजा विधि इस प्रकार है:
- निर्जला एकादशी के दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान करें और संभव हो तो पीले वस्त्र धारण करें।
- घर के मंदिर में घी का दीपक जलाकर भगवान विष्णु के समक्ष व्रत का संकल्प लें।
- सर्वप्रथम भगवान गणेश की पूजा करें, तत्पश्चात विष्णु जी को पंचामृत से स्नान कराएं।
- भगवान को पीले चंदन, पीले फूल और वस्त्र या कलावा अर्पित करें।
- विष्णु जी को तुलसी के पत्ते या मंजरी अवश्य अर्पित करें, ध्यान रहे कि तुलसी एक दिन पहले ही तोड़ी गई हो।
- भगवान को धूप, दीप और नैवेद्य का भोग लगाएं।
- ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का कम से कम 108 बार जाप करें।
- पूजा के अंत में व्रत की कथा का पाठ करें और गणेश जी तथा भगवान विष्णु की आरती करें।
मंत्र और साधना
इस दिन विष्णु सहस्रनाम या विष्णु चालीसा का पाठ करना अत्यंत लाभकारी माना जाता है। निर्जला एकादशी का व्रत पूर्ण श्रद्धा और सात्विक भाव से करने पर भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है और आध्यात्मिक उन्नति के मार्ग प्रशस्त होते हैं।
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